योग के बारे में (yoga)

सुदर्शन क्रिया से एकतत्त्वभ्यास

महृषि पतंजलि हमारे मन के बड़े अच्छे विशेषज्ञ है। महृषि पतंजलि जानते थे की कोई भी व्यक्ति सभी के लिए एक जैसा भाव नहीं रख सकते और भावनाएं बदलती रहती हैं और पोषित भी की जा सकती हैं। 

इसीलिए वह कहते हैं की मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के अलग अलग भाव रखकर चित्त को सुखद रखा जा सकता है और इस अभ्यास से एक सिद्धांत पर ध्यान रखना सुलभ हो जाता है, एकतत्त्वाभ्यास लगने लगता है।

यदि यह भी मुश्किल लगे, तब पतंजलि कहते हैं की मैं तुम्हे एक और सूत्र देता हूँ।

 

सूत्र 34: प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥

श्वास की प्राकृतिक लय को तोड़कर, इसे विभिन्न लयों में बांधकर रखने से भी विभिन्न बाधाओं और विक्षेपों के पार जाया जा सकता है।  यदि तुमसे कोई पूछे की महृषि  पतंजलि ने सुदर्शन क्रिया की बात कहाँ की है?

महृषि पतंजलि ने सुदर्शन क्रिया की बात सीधे सीधे नहीं की है पर इस सूत्र में उन्होंने एक संकेत छोड़ा है। हम अपनी क्रिया साधना में भी यही अभ्यास करते है, सजगतापूर्वक हम एक विशेष तरह से लयबद्ध श्वांस लेते और छोड़ते है। 

यही प्रच्छर्दन है, आती जाती श्वांस के लय को तोड़कर एक विशेष लय में श्वसन का अभ्यास करने से प्राण और श्वांस को बाँध सकते हैं। इस तरह से भी मन को शांत और एकाग्र बनाया जा सकता है। 

 

सूत्र 35 : विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी॥

 मान लो इसके बाद भी मन एकाग्र न हो अथवा तुम्हें अधूरापन लगे, तब किसी एक इंद्री के विषय वस्तु से भी मन ठहर सकता है।

जैसे उपनयन प्रक्रिया में तुम यदि किसीको निहार रहे हो, थोड़े समय में ही तुम्हें लगेगा की तुम्हारा मन ठहर गया है और तुम पूरी तरह से वहीँ होते हो। फिर जब तुम जैसे ही आँखें बंद करते हो, मन शांत और विश्राम में होता है। 

इसी तरह भजन गाने के बाद सत्संग में जब तुम आँखें बंद करके बैठते हो, तब उस समय भी मन ठहर जाता है। इसी तरह हम अपने शिविरों में एक अंगूर के साथ प्रक्रिया करते हैं जिसमे भी तुम पूरी तरह से स्वाद लेते हुए अंगूर का दाना खाते हो और मन पूर्ण रूप से वहीँ होता है। 

प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी, इसीलिए तुम्हें हर प्रक्रिया में पूरी तरह से भाग लेना चाहिए।  किसी किसी प्रक्रिया में तुम्हें लग सकता है की मैं ये क्यों करूँ, कैसी बच्चों की सी प्रक्रिया है पर हमें यह पता नहीं होता की हमारा मन कहाँ अटका हुआ है। मन बच्चे के जैसे ही छोटी छोटी चीज़ों में ही फंसा रहता है। 

ऐसी ही प्रक्रियाओं में एक एक विषय वस्तु के लिए पूर्ण ध्यान से मन को केंद्रित किया जा सकता है। 

आगे पतंजलि कहते है, विशोका वा ज्योतिष्मती॥

दुःख के पार जाओ, यह कैसे संभव है, जानने के लिए पढ़िए अगला ज्ञान पत्र

 

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