नवरात्रि अर्थात्‌ दिव्य नौ रातें, गहरे विश्राम और शरीर तथा मन को पुनः ऊर्जावान बनाने का उत्तम समय होता है। इसमें प्रत्येक दिन देवी माँ के नौ रूपों में से एक रूप को समर्पित किया जाता है। अंतिम दिन, अर्थात् दसवें दिन, जिसे विजयदशमी कहा जाता है, को लोक मान्यता के अनुसार बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक रूप में मनाया जाता है, परंतु वास्तव में इसका गहरा अर्थ है, सतोगुण की अन्य गुणों पर विजय, अर्थात्‌ उसी एक चेतना का प्रकट होना।

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी के पावन सान्निध्य में शक्तिशाली वैदिक मंत्रों, मौन और गहरे ध्यान का अनुभव करें। बेंगलुरु आश्रम में आयोजित नवरात्रि 2026 (11 – 20 अक्टूबर) के उत्सव में शामिल होने के लिए यहाँ क्लिक करें!

नवरात्रि का महत्व – नौ दिव्य रातें 

रात्रि शब्द का अर्थ है, वह जो हमें तीनों प्रकार की ताप से राहत या गहरा विश्राम देती है। ताप का अर्थ है तीन प्रकार की ज्वाला/अग्नि या तीन परेशानियाँ- स्थूल, सूक्ष्म और करणीय। तीन प्रकार की परेशानियाँ हैं : आदि भौतिक – सांसारिक परेशानियाँ,  आदि दैविक – लौकिक देवदूतों अथवा देवताओं के स्तर की परेशानियाँ और तीसरी आत्मा के स्तर की परेशानियाँ। नवरात्रि का समय गहन विश्राम का समय होता है, जो हमें इन तीनों परेशानियों से मुक्त कर सकता है, इसलिए यह समय प्रार्थना और पुनः ऊर्जावान बनने का समय होता है। 

नवरात्रि में आपका मन दैवीय चेतना में डूबा होना चाहिए। एक शिशु को भी जन्म लेने में नौ महीने का समय लग जाता है। उसी प्रकार यह नौ दिन भी वैसे हैं, जैसे हम माँ के गर्भ से पुनः बाहर आ रहे हों, एक नए जन्म का समय। इन नौ दिन और रातों में हमें अपने भीतर जाकर अपने मूल का स्मरण करना चाहिए। स्वयं से यह प्रश्न करो, “मेरा जन्म कैसे हुआ?”, “मेरा मूल स्रोत क्या है?” आपको अपनी चेतना पर चिंतन करना चाहिए और इन नौ दिनों को नौ महीनों की भांति देखना चाहिए। 

नवरात्रि के प्रथम तीन दिन तमोगुण या जड़ता को, अगले तीन दिन रजोगुण या बेचैनी और कार्यशीलता को और अंतिम तीन दिन सतोगुण या पवित्रता और उच्च स्तरीय प्राण शक्ति को समर्पित होते हैं। हमारे भीतर तीनों गुण होते हैं : सत्व, रजस और तमस। और इन तीनों गुणों पर विजय पाने अर्थात् केंद्रित रह कर जीवन का उत्सव मनाने के प्रतीक – अंतिम दिन को विजयदशमी कहते हैं।

गहरा विश्राम करने का समय: अपने स्रोत की ओर जाना

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इन नौ दिनों के उत्सव का उद्देश्य व्यक्ति को उसके अंतःकरण में ले जाना और उसकी चेतना को ऊपर उठाना है – यह आंतरिक और उपरगामी यात्रा है। इन नौ पवित्र दिनों में ध्यान रखें कि छोटी छोटी बातें आपको अपने लक्ष्य से विमुख न करें। हमारा मन इतना कपटी है कि यह हमें हमारे लक्ष्य से हटा कर छोटी छोटी बातों में उलझा देता है। हमारे आसपास किसी के छींकने से या खर्राटे लेने भर से यह हमें मार्ग से भटका सकता है। और जब हम सजग रहकर यह जान लेते हैं कि हमारा मन नकारात्मकता के दुष्चक्र में जा रहा है, तो हम सजग हो जाते हैं। तब हम इधर उधर भटकते अपने छोटे मन को वश में कर सकते हैं। इसलिए यह नौ रातें हमारे लिए विश्राम का समय हैं। यदि कोई द्वंद्व उत्पन्न होता भी है तो उन सब को एक ओर रखकर अपने भोलेभाले मूल स्वभाव में वापस आ जाओ।

यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा, एक ही शक्ति से बना है, जिसे देवी कहते हैं। पूरा ब्रह्मांड उसी एक तरंगित और अदृश्य दिव्य चेतना से बना है, जिसमें हमारे शरीर किसी सागर में तैरते हुए शंखों और सीपों की भाँति हैं। आप उसे देख नहीं सकते, किंतु अनुभव कर सकते हो। इसलिए इन नौ दिनों में आपको उस अगोचर शक्ति का अनुभव करना चाहिए। यह यात्रा उस अदृश्य की ओर ही है। 

नवरात्रि के अनुभव को गहरा बनाना

इन दस दिनों में हम ध्यान करते हैं और स्वयं के संग रहते हैं। नवरात्रि का उत्सव मनाने का सर्वोत्तम तरीका है, उपवास रखना, प्रार्थना करना और अंत में उत्सव तथा भोज। परंतु मैं यह परामर्श नहीं देता कि प्रत्येक व्यक्ति भोजन के बिना रह कर उपवास करे। आप सीमित मात्रा में भोजन ले सकते हैं, फल खा सकते हैं और कम खा सकते हैं। मान लीजिए, यदि आप एक सम्पूर्ण आहार ले रहे हैं, तो उसकी मात्रा आधी या एक चौथाई कर सकते हैं। हम प्राय: दिन भर कुछ न कुछ अल्पाहार या स्नैक्स खाते ही रहते हैं। इससे बचना होगा। और किसी भी इन्द्रिय गतिविधि में अति न करें, अपनी पाँचों इन्द्रियों को गहरा विश्राम दें।

प्रायः सुबह उठते ही हम अपना रेडियो सेट या आईपॉड चालू कर देते हैं, यहाँ तक कि अगर हम दौड़ भी रहे हैं, तो कुछ न कुछ सुन रहे होते हैं; इससे मन पर निरंतर ध्वनियों का आक्रमण होता ही रहता है। नवरात्रि के समय में हमें अपने मन और शरीर को इन्द्रियों को उत्तेजित करने वाले बाह्य उत्प्रेरकों की बौछारों से बचाना चाहिए। आर्ट ऑफ लिविंग अन्तर्राष्ट्रीय केंद्र बेंगुलूरु में मंत्रोच्चार किया जाता है। और अंतिम दिन, जब यज्ञ आयोजित किए जाते हैं (आप इन्हें ऑनलाइन या ऑफलाइन देख सकते हैं), तब आप आराम से बैठकर मंत्रोच्चार की दिव्य तरंगों में स्नान कर सकते हैं। इसे मन्त्रस्नान कहा गया है अर्थात् मंत्रों की मधुर ध्वनियों में स्नान!

नव दुर्गा: दुर्गा के नौ रूपों का महत्व

पहला दिन – शैलपुत्री: दुर्गा का प्रथम रूप

शैलपुत्री का उदय शैल से हुआ है, जिसका अर्थ होता है, वह जो अद्वितीय है, वह जो शैलपुत्री के चरम शिखर के अनुभव से उत्पन्न हो। 

दूसरा दिन – ब्रह्मचारिणी: द्वितीय रूप

ब्रह्म का अर्थ है, अनंत और ब्रह्मचारिणी वह है, जो अनंतता में विचरण करती है।

इसका एक अन्य अर्थ है देवी माँ का कुंवारा पक्ष – यह ऊर्जा पवित्र, अक्षत है, जो सूर्य की रश्मियों की भाँति, वैसे तो प्राचीन है किंतु हर पल निर्मल और नूतन भी है। दुर्गा के द्वितीय रूप में यह नयापन दर्शाया गया है।

तीसरा दिन – चन्द्रघंटा: तृतीय रूप

चन्द्रघंटा का अर्थ है, चन्द्र, चाँद या वह जिसका संबंध मन से हो, वह जो मन को आनंदित करता है, वह जो सौन्दर्य का साकार रूप है। जहाँ कहीं भी आपको कुछ भी सुंदर दिखता या लगता है तो वह  देवी माँ की ऊर्जा के कारण ही है।

चौथा दिन – कूष्मांड: चतुर्थ रूप

कूष्मांड का अर्थ है ऊर्जा का गोला, प्राण शक्ति। जब भी आप प्रचण्ड ऊर्जा या प्राण शक्ति अनुभव करते हो, तो जान लो कि यह देवी माँ, दुर्गा का ही एक रूप है।

पाँचवा दिन – स्कंदमाता: पंचम रूप

स्कंदमाता, माँ जैसी ऊर्जा है, वह आपकी अपनी माँ जैसी है। स्कंदमाता अर्थात्  ज्ञान के सभी छ: दर्शन शास्त्रों – न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, वेदान्त और उत्तर मीमांसा; वेदों के छ: अँग या शाखाएं या षड् दर्शन। ज्योतिष शास्त्र, संगीत, छन्द स्वरविज्ञान और बहुत से अन्य दर्शनशास्त्र, कला और विज्ञान, ज्ञान, के 64  विभिन्न विषय ये सब इसमें सम्मिलित हैं। स्कंदमाता इस सब ज्ञान की माँ हैं।

छठा दिन – कात्यायनी: छठा रूप

कात्यायनी, देवी का वह रूप है, जो चेतना के साक्षी पक्ष से उदय होती है; वह चेतना जिसमें अंतर्ज्ञान की योग्यता है।

सातवाँ दिन – कालरात्रि: सप्तम् रूप

कालरात्रि घोर, घुप्प अँधेरी ऊर्जा है, वह गहरा स्याह पदार्थ जिसमें अनंत ब्रह्मांड समाया हुआ है, और जो प्रत्येक जीवात्मा को शांति देने वाला है। यदि आप प्रसन्न और सुखी महसूस करते हैं, तो यह रात्रि के आशीर्वाद के कारण ही है। कालरात्रि, देवी माँ का वह रूप है जो इस ब्रह्मांड से भी परे है और वह प्रत्येक हृदय और आत्मा को ढाढ़स बंधाता है।

आठवाँ दिन – महागौरी: अष्टम रूप

महागौरी, देवी का वह रूप है, जो अति सुंदर है, जो जीवन को गति और परम मुक्ति देती है। यह आपको परम मुक्ति देने वाली है।

नौवाँ दिन – सिद्धिदात्री: नवम् रूप

सिद्धिदात्री जीवन में पूर्णता और सिद्धियाँ लाती है। देवी माँ का आशीर्वाद जीवन में अनेक चमत्कार लाता है। हमारे लिए जो असंभव दिखता है, माँ उसको संभव करती है।

और अंतिम दिन अर्थात्‌ दसवें दिन विजयदशमी होती है – नवरात्रि का समापन उत्सव से होता है और आप स्वयं को भावनात्मक, आध्यात्मिक तथा बौद्धिक स्तर पर ऊर्जावान अनुभव करते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

‘नवरात्रि’ का अर्थ है नौ दिव्य रातें। यह शरीर और मन को गहराविश्राम देने और स्वयं को पुनः ऊर्जावान बनाने का सर्वोत्तम समय है। इन नौ दिनों में व्यक्ति अपने अंतःकरण की ओर आंतरिक यात्रा करता है। यह समय हमें जीवन की तीनों प्रकार की परेशानियों (आदिभौतिक, आदिदैविक और आध्यात्मिक) से मुक्त कर एक नए जन्म का अनुभव कराता है।
नवरात्रि के नौ दिन हमारे भीतर उपस्थित तीन गुणों के शुद्धिकरण और उन पर विजय पाने को दर्शाते हैं:
1. प्रथम तीन दिन (तमोगुण): यह जड़ता, आलस्य और अज्ञानता को दूर करने का समय है।
2. अगले तीन दिन (रजोगुण): यह मन की बेचैनी, अति-सक्रियता और इच्छाओं को शांत करने का प्रतीक है।
3. अंतिम तीन दिन (सतोगुण): यह पवित्रता, स्पष्टता और उच्च स्तरीय प्राण शक्ति को समर्पित हैं।
नवरात्रि में माँ दुर्गा के नौ रूपों (नवदुर्गा) का ध्यान किया जाता है, जिनका आध्यात्मिक अर्थ इस प्रकार है:
1. शैलपुत्री: जो अद्वितीय हैं और चेतना के चरम शिखर से उत्पन्न हैं। 
2. ब्रह्मचारिणी: जो अनंतता में विचरण करती हैं; सूर्य की रश्मियों की तरह नूतन ऊर्जा।
3. चंद्रघंटा: जिसका संबंध मन से है; जो मन को आनंदित करती हैं और सौंदर्य का साकार रूप हैं।
4. कूष्मांडा: प्राण शक्ति या प्रचंड ऊर्जा का गोला।
5. स्कंदमाता: ज्योतिष, संगीत, कला सहित सभी 64 प्रकार के विद्याओं और दर्शनशास्त्रों की माँ।
6. कात्यायनी: चेतना का वह साक्षी भाव जिसमें अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है।
7. कालरात्रि: जो हर जीवात्मा को गहन शांति और ढाढ़स बंधाती है।
8. महागौरी: जो अति सुंदर हैं और जीवन को परम गति व मुक्ति प्रदान करती हैं।
9. सिद्धिदात्री: जो जीवन में पूर्णता लाती हैं और असंभव को संभव बनाती हैं।
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी के अनुसार, नवरात्रि का सच्चा अनुभव पाने के लिए हमें अपनी पाँचों इंद्रियों को विश्राम देना चाहिए:
1. उपवास: शरीर को हल्का रखने के लिए सीमित आहार या फल लें, दिनभर स्नैक्स खाने से बचें।
2. मौन और ध्यान: अपनी चेतना को ऊपर उठाने के लिए बाहरी शोर से बचें और ध्यान करें।
3. मंत्रस्नान: सुबह उठते ही मोबाइल या गैजेट्स का शोर सुनने के बजाय, आराम से बैठकर वैदिक मंत्रोच्चार की दिव्य तरंगों में स्नान करें।
दसवाँ दिन विजयदशमी कहलाता है। लोकमान्यता में इसे बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से यह सतोगुण की अन्य गुणों पर विजय का प्रतीक है। जब आप अपने भीतर के द्वंद्वों को पार कर शुद्ध चेतना में केंद्रित हो जाते हैं, तब जीवन का जो उत्सव शुरू होता है, वही विजयदशमी है।