अष्टकम संस्कृत भाषा में रची गई एक प्रकार की रचना को कहा जाता है जिसमें आठ छन्द होते हैं। प्राचीन युग के ऋषियों ने इस प्रकार की संगीतमय रचनाएँ अति लोकप्रिय हुआ करती थी। प्राचीन भारतीय साहित्य के इतिहास में अनेकों अष्टकम का मिलना इसी तथ्य को प्रमाणित करता है। 

महत्व

शिव लिंगाष्टकम, जो समूचे भारतवर्ष के मंदिरों और शिवालयों से गुंजायमान होता रहता है। अनगिनत लोग इस रचना की पवित्र ध्वनि को सुन कर जागते हैं जिसे उस क्षेत्र विशेष के सांस्कृतिक लोकाचार अनुसार मधुर धुन में लयबद्ध किया गया होता है। 

इसकी रचना आदि शंकराचार्य, जिनको स्वयं भगवान शिव का अवतार माना जाता है, द्वारा की गई थी और इस काव्य की रचना भगवान शिव के लिंग रूप की स्तुति में प्रार्थना के रूप मे की गई है। इस प्रार्थना में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, विनयशीलता, निष्ठा तथा भक्ति को प्रकट किया गया है। शिवलिंग शिव और शक्ति की शाश्वत लीला से उत्पन्न ब्रह्मांड का प्रतीकात्मक रूप है। शिव लिंगाष्टकम में भगवान शिव की महिमा और शिवलिंग की आराधना से होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है। 

श्रावण का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के किए सबसे शुभ माना जाता है। इस मास में शिव पूजा प्रतिदिन की जाती है जिसमें शिव लिंगाष्टकम का पाठ किया जाता है। भक्त इस श्लोक का जाप सुबह या शाम, सूर्योदय या सूर्यास्त के समय शिव पूजा करते हुए या शिव का ध्यान करते हुए करते हैं।

शिव लिंगाष्टकम के संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी अर्थ (Shiva Lingashtakam Lyrics, meaning in Hindi)

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभाषितशोभितलिङ्गम्। 

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्॥१॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जो ब्रह्मा जी, भगवान विष्णु तथा अन्य देवताओं के भी आराध्य हैं, जो स्वयं निरंजन, आलोकित तथा सुशोभित हैं, और जो जन्म मृत्यु के चक्र से जुड़े सभी दुःखों का नाश करने वाले हैं। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहन करुणाकर लिङ्गम्।

रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥२॥

उस शाश्वत शिव लिंग को नमन करता हूँ, जो सभी देवताओं तथा उच्चतम शिखरों पर विराजित ऋषियों के आराध्य हैं, जो सभी इच्छाओं को भस्म कर देते हैं, जो करुणामयी हैं और जिन्होंने रावण के अहंकार को चकनाचूर कर दिया। उमैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्।

सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥३॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ जो अनेकों प्रकार के सुगंधित लेपों से सुसज्जित है, जिनके कारण ही व्यक्ति में आध्यात्मिक ज्ञान और विवेक का उदय होता है, और जिसकी स्तुति सिद्ध पुरुषों, देवताओं और असुरों द्वारा भी की जाती है। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टित शोभित लिङ्गम्।

दक्षसुयज्ञविनाशन लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥४॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जो स्वर्ण व अन्य बहुमूल्य रत्नों से सुसज्जित है, जिसपर भयानक भुजंग लिपटे हैं, और जिन्होंने राजा दक्ष द्वारा आयोजित विशाल यज्ञ को ध्वंस कर दिया। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।

सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥५॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जिनका कुमकुम और चंदन के लेप से अभिषेक किया गया है, जो कमल की सुंदर मालाओं से सुशोभित हैं, और जो जन्मों के अर्जित पापों का नाश करने वाले हैं। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

देवगणार्चित सेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम्।

दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥६॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जिनकी पूजा देवताओं के समूहों द्वारा सच्ची भावना और भक्ति के साथ की जाती है, और जिनका तेज लाखों सूर्यों की रोशनी के समान है। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्।

अष्टदरिद्रविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥७॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जो आठ पंखुड़ी वाले पुष्पों (अर्थात् कमल पुष्पों) से घिरे हुए हैं, जो पूरी समष्टि के निर्माण के पीछे का कारण है, और जो आठ प्रकार की निर्धनताओं को समाप्त करते हैं। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

सुरगुरुसुरवरपूजित लिङ्गं सुरवनपुष्प सदार्चित लिङ्गम्।

परात्परं परमात्मक लिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम्॥८॥

उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ, जिनकी पूजा सभी देवों के गुरु, बृहस्पति तथा महानतम देव भी करते हैं, जिनकी पूजा सदैव स्वर्ग के उद्यानों से लाए पुष्पों से ही होती है, वो उद्यान जो सर्वोत्तम से भी उत्तम और महान से भी महान हैं। मैं उस शाश्वत शिवलिंग को नमन करता हूँ।

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

जो कोई भी शिवलिंग के निकट लिंगष्टकम का भजन करता है, अंत समय में वह शिव धाम को प्राप्त होता है और उनकी कृपा का पात्र बनता है।

शिव लिंगाष्टकम वीडियो

शिव लिंगाष्टकम पाठ के लाभ (Shiva Lingashtakam ke fayde)

अंतिम छंद एक विशेष श्लोक है जो शिव लिंगाष्टकम का पाठ करने के लाभों का सारांश देता है। इस स्तोत्र के नियमित जाप से होने वाले कुछ लाभ यह हैं:

  1. मानसिक शांति देता है तथा नकारात्मक ऊर्जा, बुराइयों तथा नकारात्मक विचारों को दूर करता है।
  2. अच्छा स्वास्थ्य, समृद्धि तथा ज्ञान प्रकट होता है।
  3. सकारात्मकता, आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाता है तथा कार्यसिद्धि के लिए किए गए प्रयासों में आने वाले विघ्नों को दूर करता है।
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शिव लिंगाष्टकम पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

शिव लिंगाष्टकम एक आठ-श्लोकों (अष्टकम) का स्तोत्र है, जिसमें भगवान शिव के लिंग रूप (शिवलिंग) की महिमा और दिव्यता का वर्णन किया गया है।
शिव लिंगाष्टकम की रचना आदि शंकराचार्य, जिनको स्वयं भगवान शिव का अवतार माना जाता है, द्वारा की गई थी और इस काव्य की रचना भगवान शिव के लिंग रूप की स्तुति में प्रार्थना के रूप मे की गई है। इस प्रार्थना में भगवान शिव के प्रति श्रद्धा, विनयशीलता, निष्ठा तथा भक्ति को प्रकट किया गया है।
1. इसमें शिवलिंग को “शाश्वत लिंग” कहा गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और अन्य देवताओं द्वारा भी पूजनीय है। 
2. यह लिंग, जन्म और मृत्यु के दुःखों का नाश करने वाला माना गया है। 
3. यह स्तोत्र भक्त को मानसिक शांति, नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति और सकारात्मक उर्जा प्रदान करने में सहायक है।
शिवलिंग, शिव और शक्ति की शाश्वत लीला का प्रतीक है। यह निराकार परमपुरुष (शिव) का प्रतिनिधित्व करता है और सृष्टि-रचना, पालन और विनाश की शक्तियों का संकेत देता है।
भक्त इस श्लोक का जाप सुबह या शाम, सूर्योदय या सूर्यास्त के समय शिव पूजा करते हुए या शिव का ध्यान करते हुए करते हैं। किसी भी सोमवार, श्रावण के महीने में या महाशिवरात्रि पर इसका पाठ अत्यंत फलदायी होता है।
हाँ, स्त्री और पुरुष दोनों ही इसका पूर्ण श्रद्धा से पाठ कर सकते हैं। यह सरल और अत्यंत दिव्य स्तुत्र है जो सभी के लिए फलदायी माना जाता है।
इस स्तोत्र के नियमित जाप से होने वाले कुछ लाभ हैं:
1. मानसिक शांति देता है तथा नकारात्मक ऊर्जा, बुराइयों और नकारात्मक विचारों को दूर करता है।
2. अच्छा स्वास्थ्य, समृद्धि तथा ज्ञान प्रकट होता है।
3. सकारात्मकता, आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाता है तथा कार्यसिद्धि के लिए किए गए प्रयासों में आने वाले विघ्नों को दूर करता है।
हाँ, इसे घर में पढ़ना अत्यंत शुभ माना जाता है। शिवलिंग के समक्ष पाठ करने से वातावरण पवित्र और शांत हो जाता है।
कोई कठोर नियम नहीं है, परंतु साफ मन, पवित्र भाव और श्रद्धा के साथ पाठ करना सर्वोत्तम परिणाम देता है। शिवलिंग का जल, बेलपत्र, चंदन इत्यादि से अभिषेक करें और उसके बाद लिंगाष्टकम का पाठ करें।
शिव लिंगाष्टकम शिवलिंग की महिमा का वर्णन करने वाला शांत और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है, जबकि शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव के तांडव नृत्य और उनके उग्र रूप का वर्णन करता है।
नहीं। यह पाठ घर पर पूजा-स्थान, पूजा-कक्ष या शांत कोने में भी किया जा सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठ को श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाए।
“निर्मलभाषित शोभित लिंगम्” – पवित्र एवं प्रकाशमान लिंग। 
“जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गम्” – जन्म और दुःख का नाश करने वाला लिंग। 
“कनकमहामणिभूषितलिङ्गम्” – स्वर्ण और रत्नों से अलंकृत लिंग, साथ ही साँपों द्वारा वेष्टित। 
“अष्टदलोपरिवेष्टित लिङ्गम्” – आठ-पंखुड़ियों वाले पुष्पों से घिरा लिंग, जो समष्टि का कारण है। 
“दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गम्” – सूर्य के समान तेजस्वी, लाखों सूर्यों जैसा प्रकाशमान लिंग।

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