ध्यान क्या है?

ध्यान एकाग्रता नहीं है। यद्यपि यह एक आम धारणा है। यह मात्र बैठना और किसी भी वस्तु, किसी बात के विषय में सोचना भी नहीं है। ध्यान तो गहरी विश्रांति और सजगतापूर्वक विश्राम करना है। हम सभी ऐसा गहरा विश्राम चाहते हैं, जो हमें ताजगी और स्फूर्ति से भर दे और जब हम उठें, तो हम कुछ सार्थक कर सकें। प्रश्न उठता है कि हमें ऐसा विश्राम कब मिल सकता है? यह तभी संभव है जब हम अन्य सभी गतिविधियाँ, सभी कार्य छोड़ दें। वास्तव में ध्यान कुछ न करने की कोमल कला है।

ध्यान हमारे मन के लिए एक प्रकार का एयर कंडीशनर है – पूर्णतः आरामदायक! हम आराम चाहते तो हैं, किंतु पूर्ण रूप से विश्राम में कैसे जाएँ, यह हमें नहीं पता। ध्यान हमें इसका समाधान देता है।

ध्यान करने के अनेक तरीके हैं और अनेक प्रकार के ध्यान उपलब्ध हैं। जब गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी ने पैंतालीस से अधिक वर्ष पहले ध्यान सिखाना आरंभ किया था, तो उस समय यह धारणा थी कि योग तथा ध्यान का मार्ग साधारण व्यक्ति के लिए नहीं है। लोग यह समझते थे कि यह तो एकांतवास में और दुनिया से अलग रहने वालों के लिए है, साधारण व्यक्तियों के लिए नहीं। किंतु आज के समय में दुनिया भर की लगभग एक तिहाई आबादी योग और ध्यान का अभ्यास कर रही है।

नये लोगों के लिए ध्यान के प्रकार

यदि आप इंटरनेट पर खोजेंगे, तो पाएँगे कि ध्यान को अनेक तरीकों से भिन्न भिन्न श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। आमतौर पर ध्यान को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:

  • सचेतनता (माइंडफुलनेस) ध्यान
  • स्नेहमयी अनुकंपा अथवा करुणा ध्यान
  • केंद्रित एकग्रता
  • गतिशीलता या योग ध्यान
  • जेन, श्वसन क्रिया ध्यान
  • मंत्र ध्यान
  • जप ध्यान
  • यंत्रवत आत्म-उत्कृष्ट ध्यान

परंतु वैदिक कालीन ज्ञान के आधार पर ध्यान को विभिन्न श्रेणियों में बाँटने का एक और मौलिक तरीका है। इसे जान कर आप यह पता लगा सकते हैं कि वर्तमान समय में आपके लिए कौनसा तरीका सर्वोत्तम रहेगा। कालान्तर में आप ध्यान की अन्य विधियाँ भी सीख सकते हैं, परंतु यह सुनिश्चित करें कि आप किसी भी विधि का अभ्यास पर्याप्त अवधि तक करें। आइए ध्यान की इन विधियों के विषय में और जान लें:

1. योग तथा शारीरिक व्यायाम

पहली विधि है, योग और शारीरिक व्यायाम के द्वारा। जब हमारा शरीर विशिष्ट लयबद्धता के साथ विशिष्ट मुद्राएँ और आसन करता है, तो हमारा मन ध्यान में उतर जाता है। शरीर में खिंचाव और संकुचन लाने से हमारा मन सजगता की ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है, जिसे हम ध्यान कह सकते हैं। शारीरिक व्यायाम से हमारा मन एक सीमा तक शांत हो सकता है। व्यायाम और शरीर साधने से पूर्ण रूप से तो नहीं, किंतु कुछ सीमा तक ध्यानस्थ अवस्था में पहुँचा जा सकता है। योग तथा ताई-ची शारीरिक व्यायाम द्वारा ध्यानस्थ अवस्था को अनुभव करने के कुछ उदाहरण हैं। शरीर के इस भौतिक स्वरूप का उपयोग अनेक “गतिशीलता से ध्यान” तकनीकों में किया जाता है।

2. श्वास क्रियाएँ और प्राणायाम

दूसरी विधि श्वसन क्रियाओं और प्राणायाम के उपयोग की है। इनके प्रयोग से मन शांत और स्थिर हो जाता है और आप सहज ही ध्यान में उतर जाते हो। साँस द्वारा मन शांत हो जाता है और हम आसानी से ही ध्यान में उतर जाते हैं। सुदर्शन क्रिया इसका एक अनुपम उदाहरण है। प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया के उपरान्त, जब आप ध्यान करने बैठते हैं, तो सहज ही ध्यान में उतर जाते हैं। इस प्रकार, श्वास तकनीक भी ध्यान में जाने का एक उपाय है।

सिंगापुर में किए गए एक शोध में पाया गया है कि सुदर्शन क्रिया योग के नियमित अभ्यास और नींद की गुणवत्ता सुधारने तथा तनाव कम करने के बीच गहरा संबंध है। [पबमेड, 2020]

3. इंद्रियों का उपयोग

तीसरा तरीका है, किसी भी इन्द्रिय सुख – दृष्टि, ध्वनि, स्वाद, गंध अथवा स्पर्श के द्वारा ध्यान। किसी विशेष इन्द्रिय सुख में शत प्रतिशत संलिप्त होने पर भी ध्यान की अवस्था प्राप्त हो सकती है। पाँचों इन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों – आँख, नाक, कान, जीभ और त्वचा, में से किसी के द्वारा भी व्यक्ति अविचार की स्थिति – विचार शून्यता, शान्ति, निस्तब्धता तथा आंतरिक सुंदरता का अनुभव कर सकता है।
हमारी पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ पंच तत्वों से संबंध रखती हैं। यह संसार पाँच तत्वों से मिल कर बना है : पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश। अग्नि का संबंध हमारी आँखों से है, गंध का पृथ्वी से, स्वाद का जल तत्व से, ध्वनि का आकाश से और स्पर्श का वायु तत्व से। यदि आप पानी में हैं तो आपको स्पर्श का उतना अनुभव नहीं होगा। आपने कभी इस पर गौर किया है? अधिक नहीं बस थोड़ा अनुभव होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक तत्व में बाकी चारों तत्व भी अल्प मात्रा में रहते हैं। जैसे जल में भी वायु तत्व का कुछ अंश होता है, अल्प मात्रा में ही सही। इस प्रकार ब्रह्माण्ड के यह पाँचों तत्व हमारी पाँच इन्द्रियों से संबद्ध हैं। और आप इनमें से किसी भी एक से होते हुए उससे परे जा सकते हैं और ध्यान की गहरी अवस्था अनुभव कर सकते हैं।
यदि आप किसी लॉलीपॉप खाते बच्चे को देखेंगे, तो पाएँगे कि वह बच्चा उस कैंडी के टुकड़े का आनंद लेने में पूर्ण रूप से मग्न है। उस समय यदि आप उस बच्चे से उसका नाम भी पूछोगे तो वह उसका उत्तर नहीं देगा! किसी विशिष्ट ज्ञानेन्द्रिय में 100% लिप्त होने से भी आप ध्यान की अवस्था में आ सकते हैं। 

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में हुए 47 परीक्षणों में पाया गया कि सचेतन ध्यान (माइंडफुलनेस ध्यान) से हमारे भीतर तनाव, चिंता तथा अवसाद की भावनाएँ कम होती हैं। [हार्वर्ड हेल्थ, 2014]
इस सिद्धांत का उपयोग आंशिक रूप से सचेतन ध्यान, जाप ध्यान तथा केंद्रित एकाग्रता ध्यान तकनीकों में किया जाता है।

4. भावनाएँ

चौथी विधि सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार की भावनाओं के उपयोग की है। जब कभी भी आप नितांत असहाय, निराश अथवा, अति क्रोध में होते हैं और कहते हैं, “मैं हार गया/ मैं छोड़ता हूँ!”, तो इसका अर्थ है ‘बहुत हो गया, मैं और सह नहीं सकता।’ सदमे की स्थिति भी आपको ध्यान की अवस्था में ले जा सकती है। यदि आप निराशा, अवसाद अथवा हिंसा की स्थिति में नहीं जाते हैं, तो पाएँगे कि एक पल आता है, जब सब कुछ विच्छेद हो जाता है और अविचार (विचार शून्यता) की स्थिति आ जाती है। इस प्रकार, भावनाएँ चाहे सकारात्मक हों या भय जैसी नकारात्मक, उनसे मन ठहर जाता है, स्थिर हो जाता है। यह आपको ध्यान की उसी स्थिर अवस्था में पहुँचा देता है। “स्नेहमयी अनुकंपा” तथा “करुणामयी ध्यान” में ध्यान के लिए भावनाओं के उपयोग का ही उल्लेख मिलता है।

विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के न्यूरोसाइंस अनुसंधान में पाया गया कि अनुकंपा ध्यान मस्तिष्क के उन अंशों को सक्रिय कर देता है जो हमारी सहानुभूति और भावनाओं से जुड़े होते हैं। [यू डबल्यू – मैडिसन, 2008]

5. ज्ञान और सजगता

ध्यान की पाँचवीं श्रेणी है, बुद्धि, ज्ञान और सजगता के उपयोग से। इसे ज्ञान योग कहा गया है। यदि आपने क्वांटम फिजिक्स पढ़ा है, तो आपको यह आभास होने लगता है कि प्रत्येक वस्तु केवल अणु अथवा केवल ऊर्जा ही है। यदि आप क्वांटम फिजिक्स पढ़ने के उपरान्त वेदान्त अथवा ध्यान और योग की कला का अध्ययन करेंगे तो पाएँगे कि दोनों में अनेक समानताएँ हैं। आपको लगेगा कि दोनों में उपयुक्त भाषा भी एक ही है। इस संदर्भ में, यदि आप बैठकर विचार करते हैं तो पाएँगे कि यह शरीर अरबों खरबों कोशिकाओं से बना है और उसके भीतर गहरे में कुछ सक्रिय हो रहा है।
और यदि आप किसी खगोलीय संग्रहालय में जाते हैं तो वहाँ से बाहर निकलने पर आपकी मनोस्थिति कुछ अलग ही होगी। आपको अपने भीतर कुछ बदला बदला अनुभव होगा क्योंकि आपने अभी अभी ब्रह्मांड के विशाल परिपेक्ष्य में स्वयं को देखा है। आप कौन हैं? आप क्या हैं? आप कहाँ हैं? आपका अस्तित्व इस विशाल, अथाह अनंत ब्रह्माण्ड की तुलना में क्या है? जैसे ही आप ब्रह्मांड की विशालता को लेकर सजग होते हैं, तो अपने जीवन के प्रति आपका दृष्टिकोण तुरंत ही बदल जाता है: आपके भीतर कुछ परिवर्तित हो जाता है। यह आपको ध्यान में उतार देता है।

6. निजी मंत्र

मन को उथल पुथल और अराजकता की स्थिति से आनंद की अवस्था में ले जाना, बेचैनी से गहरी शांति की स्थिति में ले जाना, यही अर्थ और उद्देश्य है ध्यान का। इस प्रक्रिया में हम किसी ध्वनि का, आदिकालीन मूल ध्वनि का, और कुछ प्राचीन ध्वनियों, जिन्हें मंत्र कहा गया है, का उपयोग कर सकते हैं, जिससे मन को मौन की अवस्था में लाया जा सकता है। वह ध्वनि, जो छोटे मन को बड़े मन की ओर ले जाती है, वही मंत्र है। वह जो चंचल और अभिलाषी मन को सन्तुष्टता की ओर लेकर जाता है। वह जो आपके जीवन का बीज है। जब मन और मंत्र एक होते हैं, तो वह ध्यान होता है।

इस प्रकार के ध्यान को प्रायः मंत्र अथवा यंत्रवत आत्मउत्कृष्ट ध्यान की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार मंत्र आधारित ध्यान (उदाहरणार्थ सहज समाधि) मन को शीघ्र ही स्थिर  कर देते हैं और यह उपाय गहन विश्रांति के लिए सर्वाधिक प्रभावी तरीकों में से एक है। [साइकोलॉजी टुडे, 2021]

‘सहज समाधि ध्यान’ ऐसी ही एक तकनीक है जिसमें इस सिद्धांत का उपयोग किया गया है। यह अत्यंत सरल और कुछ मायनों में ध्यान करने का सबसे सुंदर तरीका है। “सहज” – जिसका अर्थ है सरल। यह विचारों से पार जाने और अपने अस्तित्व के मूल स्रोत में जाने के लिए एक शुद्ध प्राकृतिक उपाय है। इसलिए इसमें आप यह करते हैं कि आप एक निजी मंत्र धारण करते हैं और फिर उसे अपने भीतर सहेज कर सुरक्षित रखते हैं। यह ठीक वैसा है जैसे हम एक बीज बोते हैं और फिर उसे मिट्टी से ढक देते हैं। फिर उस बीज की जड़ें नीचे की ओर तथा टहनियाँ ऊपर की ओर बढ़ती हैं। “सहज समाधि” ऐसे ही ध्यान के बीज को बोने की तकनीक है। उसके पश्चात प्रतिदिन इसका अभ्यास करने से आप आनंद, स्पष्टता, शांति और अंतर्ज्ञान का अनुभव करने लगते हैं। जीवन में सब कुछ खिलने लगता है। और आप कहीं पर भी, ट्रेन, कार या हवाई जहाज में यात्रा करते हुए भी, यह ध्यान कर सकते हैं।

और अंत में, ध्यान करने के लिए आपको केवल यह जानना आवश्यक है कि विश्राम कैसे किया जाए। यदि आप मालिश की मेज पर हैं तो स्वयं कुछ नहीं करते, अपितु सब कुछ मालिश करने वाले पर छोड़ देते हैं ताकि वह आपका ध्यान रखे। उसी प्रकार ध्यान करते समय भी आप को कुछ नहीं करना होता। सब कुछ  प्रकृति अथवा उस चैतन्य शक्ति पर छोड़ देना भर है। ध्यान का नियमित अभ्यास आपके स्नायु तंत्र को सुधार कर उसे दिन भर शांत रहने, ऊर्जावान बनाए रखने तथा अधिक सजग रहने के लिए  जीवन का कायाकल्प कर देता है। जब आप चेतना के उच्चतर स्तर पर पहुँच जाते हैं, तो आप पाते हैं कि आप जीवन की विभिन्न परिस्थियों और चिंताओं के कारण विचलित नहीं होते। आप  किसी भी परिस्थिति में शोभायमान रहते हुए सुदृढ़ बने रहते हैं और विभिन्न चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होते हैं।

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गुरुदेव का कालातीत ज्ञान

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संसाधन

विभिन्न प्रकार के ध्यान पर पूछे जाने वाले कुछ सामान्य प्रश्न

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर की शिक्षाओं के आधार पर, आप ध्यान में कैसे उतरते हैं, उसके अनुसार ध्यान की श्रेणियां इस प्रकार हैं:
निजी मंत्र द्वारा
शरीर द्वारा (योग, व्यायाम आधारित ध्यान)
श्वास प्रक्रिया द्वारा (प्राणायाम, सुदर्शन क्रिया)
इन्द्रियों के माध्यम से (अविचार अवस्था, जाप, केंद्रित सजगता)
भावनाओं द्वारा
नये लोगों के लिए सहज समाधि ध्यान की सबसे अधिक अनुशंसा की जाती है क्योंकि इसका अभ्यास सरल, सहज और श्रम रहित है। इसमें एक निजी मंत्र का उपयोग किया जाता है, जो किसी पूर्व अभ्यास अथवा मानसिक श्रम के बिना ही मन को तुरंत  स्थिर और शांत कर देता है।
मंत्र आधारित या यंत्रवत आत्मउत्कृष्ट ध्यान, विशेष रूप से सहज समाधि ध्यान, सबसे शक्तिशाली माना जाता है। यह बिना किसी श्रम के मन को विचारों से परे ले जाने में सहायक है, जिससे गहरा विश्राम मिलता है, मन में स्पष्टता आती है तथा सजगता का विकास होता है।
सहज समाधि गहरे विश्राम में ले जाने वाले ध्यान की एक श्रेणी है, जिसमें एक निजी मंत्र के उपयोग से मन को शांत किया जाता है। “सहज” का अर्थ है सरल या बिना किसी प्रयत्न से, और “समाधि”  का अर्थ है, समभाव या गहरे विश्राम की अवस्था। इसे कहीं पर भी किया जा सकता है – घर में अथवा यात्रा करते हुए – और इससे अंतर्ज्ञान, शांति तथा आनंद में बढ़ोत्तरी होती है।
अपनी रुचि अनुसार आप इनमें से चुन सकते हैं:
यदि आपको हिलना डुलना पसंद है, तो आप योग आधारित ध्यान करें।
यदि आपको श्वास लेने से शांति मिलती हो, तो सुदर्शन क्रिया अथवा प्राणायाम ध्यान करें।
यदि आप भावनात्मक रूप से संवेदनशील हो, तो भावनाओं को परिवर्तित करने वाले इस ध्यान को करें।
यदि आप प्रयत्न से बचना चाहते हैं, तो निजी मंत्र ले कर सहज समाधि ध्यान आरम्भ करें। 
नहीं, यह एक व्यापक रूप से प्रचारित भ्रांति है। ध्यान का अर्थ मन को एकाग्र करना अथवा गहरा सोचना कदापि नहीं है। यह तो कुछ भी न करने की एक कला है – छोड़ देने और पूर्ण विश्राम में जाने की कला।
माइंडफुलनेस ध्यान में वर्तमान क्षण के प्रति सचेत जागरूकता रहती है – विशेष रूप से श्वास, संवेदनाओं और विचारों के प्रति सजग रह कर – बिना किसी राय या पूर्वाग्रह के।
सहज समाधि जैसे मंत्र ध्यान में एक विशेष ध्वनि अथवा शब्द (मंत्र) का उपयोग कर के मन को धीरे धीरे अंतर्मुखी किया जाता है, जिससे आप बिना प्रयत्न ही गहरे विश्राम की अवस्था में पहुँच जाते हैं।

संदर्भ

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