एक समाज सुधारक की प्रेरणादायक कहानी

1974: हजारों छात्र सरकार के अकुशल और भ्रष्ट कार्य से थके हुए अपने लिए एक बेहतर भारत की मांग में सड़कों पर उतर गए। उन में से एक जवान प्रवीण थे जो रांची के एक परिवार में बड़े हुए। स्वतंत्रता के कई साल बाद भी प्रवीण इस आदर्श पर पले थे कि सबसे पहले देश है। उन्होंने विद्या अर्जित करने वाले एक आन्दोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया और मुख्य आयोजन समिति का हिस्सा बने, जिसके अध्यक्ष दिग्गज जय प्रकाश नारायण थे। कुछ ही सालों में जब राजनीति अपने वचन को पूरा नहीं कर पाई तो प्रवीण ने यह महसूस किया कि राजनीति का मार्ग उनके लिए नहीं है। और इसी के साथ, प्रवीण ने स्वयं को राजनीति से दूर कर अपनी आगे की शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया।

हालांकि प्रवीण राजनीति से दूर थे लेकिन उस अनुभव ने प्रवीण को किसी उद्देश्य के लिए लोगों को एकजुट करने की कला, लोगों को प्रेरित करना, विश्वास बनाना और लोगों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने और आन्दोलन को आगे बढ़कर चलाने की कला सिखा दी। इस कला के बीज का बोना उनके बाद के जीवन में काम आया। अब राजनीति को पीछे छोड़, उन्होंने आजीविका कमाने के लिए काम करना आरंभ किया। परंतु जीवन ने उनके लिए कुछ अलग सोचा हुआ था। कोई भी ऐसी जगह नहीं थी जहाँ बिना गलत रास्ते पर चले वे अपने आदर्श बना कर रख सके। राज्य की स्थिति से थक कर और स्वयं को शक्तिहीन मानकर उन्होंने सब कुछ छोड़ने का निर्णय लिया।

एक फोन का आना

समय आया जब दैवीय शक्ति का हस्तक्षेप उनके जीवन में हुआ। वर्ष 1997 के एक शुभ दिन उन्हें आर्ट ऑफ लीविंग के एक शिक्षक का फोन आया और उन्होंने प्रवीण को एक कार्यशाला आयोजित करने के लिए कहा। आज लगभग दो दशकों के बाद प्रवीण यह सोचते हैं कि कार्यशाला के गुणों और उसके लिए काम करने के लिए उन्हें किस बात ने राजी किया था! वह इस बारे में ज्यादा नहीं सोचते क्योंकि हर प्रकार की संभावनाएँ उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। अपने सामान्य जोश के साथ वे इस कार्य में लग जाते हैं और कुछ ही समय में कार्यशाला का आयोजन भी हो जाता है।

वह मजाक में कहते हैं कि मैं खुश हूँ कि शिक्षक ने मुझे कोर्स आयोजित करने के लिए कहा, भाग लेने के लिए नहीं कहा, वरना हो नहीं पाता। पर प्रवीण ने कोर्स संगठित करने के साथ साथ उसमें हिस्सा भी लिया। वे हंसते हुए अपनी पुरानी यादों का आनन्द लेते हुए कहते हैं, “उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

परिवर्तन का मंच

आर्ट ऑफ लिविंग ने उन्हें वह मंच प्रदान किया जिसकी उन्हें प्रतीक्षा थी। संस्थापक गुरदेव श्री श्री रवि शंकर जी का कहना है कि सामाजिक विकास उनका एक बड़ा उद्देश्य रहा है।

प्रवीण मौके की तलाश में थे और जल्दी ही गाड़ी में सवार हो गए। एक के बाद एक कोर्स आयोजित करने के बाद उन्हें झलक मिली कि गुरूजी के ज्ञान और सुदर्शन क्रिया ने जीवन में कितना परिवर्तन किया है। सालों की खोज के बाद उन्हें अपने जीवन का उद्देश्य और उसे पूरा करने का रास्ता मिल गया।

1999 में प्रवीण आर्ट ऑफ लिविंग के शिक्षक बन गए। इसी समय ‘युवा नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रम’ का भी आरंभ हुआ था जो बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण आंदोलन बना। प्रवीण ने अपना दिल और आत्मा इस काम में लगा दी। वह गर्व से कहते हैं, “2001 के शुरूआत में लगभग 100 युवा नेता रांची जिले में पूर्णकालिक काम कर रहे थे जिनको प्रशिक्षण मैंने दिया।” यह कोई आसान काम नहीं था।

एक बदमाश द्वारा सम्मान प्राप्त हुआ

जीवन ने अपना उद्देश्य ढूंढ लिया है, पर बहुत सी सीखें अभी भी परदे में हैं, होनी बाकी हैं। उस समय रांची में काम करना आसान कार्य नहीं था। यह राज्य अभी हाल ही में एक लम्बी लड़ाई के बाद अलग राज्य के रूप में उभरा था और हथियारबंद मिलिटैंट नियंत्रित करने बहुत कठिन थे।

2003 में ऐसे ही हालात में प्रवीण झारखंड के एक दूर के गाँव में अपने काम के लिए निकले। उनकी मंजिल बदनामी के लिए मशहूर थी और कोई भी दोपहर के बाद उस रास्ते से नहीं जाता था। प्रवीण ऐसे डर को दूर करना चाहते थे। असल में यह ऐसे स्थान थे जहाँ उनके कार्य की बहुत आवश्यकता थी।

शाम 4 बजे के करीब एक सुनसान रास्ते पर गाड़ी खराब हो गई और कुछ ही क्षणों में बदमाशों ने उन्हें घेर लिया। उन्होंने प्रवीण को पुलिस का आदमी समझा क्यूँकि इस समय वहाँ से निकलने की कोई हिम्मत नहीं करता था। उन्होंने उनके माथे पर बंदूक रखी और हथियार डालने को कहा। अपनी जान को खतरे में जानकर प्रवीण ने अपने गुरू में विश्वास रखते हुए अपनी आँखें बंद की। एक ही क्षण में उन्होंने समूह में से एक हलचल सुनी। उनमें से एक व्यक्ति ने जेल में आर्ट ऑफ लिविंग का कोर्स किया था। उसने प्रवीण को अपने शिक्षक के रूप में पहचान लिया और अपना सम्मान देने के लिए भाग कर उनके पास पहुँचा।

दूसरे लोग अचंभित थे पर उसके पीछे आए। उन्होंने न केवल यह विश्वास दिलाया कि प्रवीण ठीक से घर पहुँचेंगे पर दूसरों के विकास के लिए उनकी काम में निष्ठा देखकर उन्होंने काम के विकास के लिए प्रतिज्ञा की।

उस दिन से प्रवीण ने अपने गुरू का आशीर्वाद अनुभव किया।

असली उन्नति सशक्तिकरण से होती है

साल दर साल, एक के बाद एक कोर्स आयोजित कर प्रवीण ने बिना थके झारखंड के गाँवों में विकास का कार्य किया। किसी भी प्रकार के विकास को दीर्घकालीन बनाने के लिए लोगों का सशक्तिकरण होना चाहिए। अगर लोगों को अपने विकास का उत्तरदायित्व दे दिया जाए तो पूरे समुदाय और देश का विकास होगा। इस तरह वास्तविक विकास होगा।

2017 में, झारखण्ड की सरकार ने आर्ट ऑफ लिविंग को 60 पंचायतें बनाने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपने क्षेत्र में एक प्रकाशस्तंभ रहेंगे। प्रवीण को इस कठिन काम को करने के लिए एक वर्ष का समय मिला। पर एक वर्ष से भी कम समय में उन्होंने झारखंड के सात जिलों में युवा नेताओं का एक समूह बना लिया और उन्हें परिवर्तन लाने के लिए तैयार किया। यह इस होनहार और प्रतिभाशाली उपदेशक द्वारा लिया गया एक उत्तम कदम था।

प्रवीण पूरे मन से यह महसूस करते थे कि झारखंड में एक मजबूत पंचायती राज था परंतु अगर आपको गाड़ी चलानी नहीं आती तो गाड़ी रखने का कोई लाभ नहीं है। इसलिए, वे अब परियोजना में जान भर रहे हैं ताकि झारखंड के पंचायत के लोगों को सशक्त कर सकें।

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अगले कदम

जब प्रवीण से पूछा गया कि एक समूह को बनाने और मुश्किल समय में इसे टिका कर रखने के लिए क्या चाहिए, प्रवीण कहते हैं, “यहाँ तीन सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं, पहली – सही योजना और दिशानिर्देश, दूसरी – काम और पैसे के प्रति अनुशासन और तीसरी – भक्ति जो काम के प्रति समर्पण लाए।”

वे कहते हैं कि विश्वास और अटूट रिश्ते ही सामुदायिक विकास कर सकते हैं। आज वह टीम झारखंड में जरुरतमंद बच्चों के लिए 22 निःशुल्क विद्यालय चला रही है। यह सभी विद्यालय श्री बी बी चावला के नेतृत्व में चले, जिन्होंने जमीनी स्तर पर यह परिवर्तन किया।

स्मरण करते हुए प्रवीण कहते हैं कि उनके गुरू की कृपा और परियोजना से लाभ उठाने वाले लोग उनके जीवन की सबसे अनमोल कमाई थी। वे मानते हैं कि यह सब उनकी पत्नी सरमिष्ठा व उनके दो बच्चों के सहयोग के बिना सम्भव नहीं था। अब साठ साल की आयु में प्रवीण एक क्षण के लिए भी यह नहीं सोचते कि उनकी जिंदगी का सुनहरी समय पीछे रह गया है। अब वे आने वाले सालों में झारखंड में 100 आदर्श गाँव खोलने की कल्पना करते हैं।

पीढ़ियों के लिए आशा की प्रेरणा

पिछले सफर को याद करते हुए, प्रविण कहते हैं कि अपने गुरु की कृपा और समय के साथ परियोजना के लाभार्थियों के साथ बने रिश्ते उनके जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति हैं।

प्रविण कुमार की कहानी धैर्य और सेवा की परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक है। रांची की अशांत गलियों से लेकर सामाजिक परिवर्तन के मार्ग तक, उनकी यात्रा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है—यह दर्शाती है कि सही मंच मिलने पर वे भी अपने समुदाय में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।

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