हम सभी जानते हैं कि क्रोध क्या है और उसका परिणाम क्या होता है। हम जानते हैं कि गुस्सा रिश्ते खराब कर सकता है, हमें नुकसान पहुंचा सकता है और प्रतिष्ठा खोने का खतरा पैदा कर सकता है। जो लोग इस तीव्र भावना का अनुभव करते हैं उन्होंने लाखों बार ‘गुस्सा मत करो’ भी सुना है। ‘गुस्सा कैसे न करें’ इसका उत्तर बहुत कम लोगों को ही मिला होगा। खैर, आज हम इसी बारे में बात करेंगे – क्रोध प्रबंधन के तरीके।

  1. क्रोध बुरा नहीं है अगर यह आपके नियंत्रण में है और यदि आप इसका संयम से उपयोग करते हैं तो यह आपका काम निकाल सकता है।
  2. आप क्रोधित हो सकते हैं, चिल्ला सकते हैं और परेशान हो सकते हैं, लेकिन यह उतनी ही देर तक रहे जितनी देर तक एक रेखा पानी की सतह पर पर बनी रह पाती है। तभी यह स्वस्थ है।
  3. अपनी मुस्कान को सस्ता (यानि प्रचुर) और गुस्से को महँगा (यानि दुर्लभ) बनाइये!
  4. जब मन भय से मुक्त, अपराधभाव से मुक्त, क्रोध से मुक्त और अधिक केंद्रित होता है, तो यह किसी भी बीमारी को ठीक करने की शक्ति रखता है।

क्रोध वह सजा है जो आप दूसरों की गलती के लिए खुद को देते हैं।

– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

  1. किसी गलती को केवल एक गलती के रूप में देखें, “मेरी” या “उसकी” गलती के रूप में नहीं। “मेरी’ का अर्थ है अपराध बोध; “उसकी” का अर्थ है क्रोध।
  2. चाहे वह लोभ हो, ईर्ष्या हो, क्रोध हो, घृणा हो या हताशा हो। इन सभी नकारात्मक भावनाओं को योग के माध्यम से ठीक किया जा सकता है या दिशा परिवर्तन किया जा सकता है।
  3. आपकी पूर्णता की अपेक्षा ही क्रोध का कारण है। अपूर्णता के लिए जगह छोड़ें. कर्म में पूर्णता लगभग असंभव है।
  4. क्रोध निरर्थक है क्योंकि यह हमेशा उस चीज के बारे में होता है जो पहले ही बीत चुकी है।
  5. जो चीज पहले ही घटित हो चुकी है उस पर क्रोधित होने का कोई लाभ नहीं है। आप बस यह कर सकते हैं अपनी ओर से भरसक प्रयास करें ताकि ऐसा दोबारा न हो।
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गुरुदेव का कालातीत ज्ञान

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क्रोध पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

गुरुदेव के अनुसार, क्रोध अक्सर अपूर्ण इच्छाओं या अतीत की घटनाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रिया है। जब चीजें हमारी योजना के अनुसार नहीं होतीं, तो मन में जो हलचल पैदा होती है, वह क्रोध का रूप ले लेती है। गुरुदेव कहते हैं कि गुस्सा बीते हुए कल के लिए होता है, जबकि मन को वर्तमान में रहना चाहिए।
नहीं, गुरुदेव ‘बुद्धिमान क्रोध’ (Intelligent Anger) की बात करते हैं। कभी-कभी अनुशासन बनाए रखने के लिए ऊपर से गुस्सा दिखाना ज़रूरी हो सकता है, लेकिन वह अंदर से आपको प्रभावित नहीं करना चाहिए। जिस तरह पानी पर खींची गई लकीर तुरंत मिट जाती है, वैसे ही क्रोध भी क्षणिक होना चाहिए।
क्रोध को दबाने (Suppress) के बजाय उसे बदलने (Transform) की आवश्यकता है। इसके लिए गुरुदेव कुछ मुख्य सूत्र बताते हैं:
1. सांसों पर नियंत्रण: सुदर्शन क्रिया और प्राणायाम मन को शांत करने के सबसे प्रभावी तरीके हैं।
2. जागरूकता: यह समझना कि क्रोध केवल आपका ही नुकसान कर रहा है।
3. क्षमा: यह मानना कि सामने वाले ने अपनी समझ की कमी के कारण गलती की है।
गुरुदेव सुझाव देते हैं कि उस स्थिति में अपनी सांसों पर ध्यान दें। गहरी लंबी सांस लें और छोड़ें। अपनी भावनाओं के प्रति सजग हो जाएं। जब आप अपने गुस्से को एक ‘तीसरे व्यक्ति’ की तरह देखते हैं, तो उसकी तीव्रता कम होने लगती है।
हाँ, नियमित ध्यान से हमारे तंत्रिका तंत्र (Nervous System) को गहरा विश्राम मिलता है। गुरुदेव कहते हैं कि जैसे-जैसे आपका ‘सत्व’ (भीतरी ऊर्जा) बढ़ता है, छोटी-छोटी बातें आपको परेशान करना बंद कर देती हैं। ध्यान आपको वह धैर्य देता है जिससे आप क्रोध की स्थिति में भी स्थिर रह सकें।
गुरुदेव अक्सर सचेत करते हैं कि क्रोध शरीर में विषाक्त पदार्थ (Toxins) पैदा करता है, जो तनाव, हाई बीपी और मानसिक थकान का कारण बनते हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के कोट्स हमें याद दिलाते हैं कि अपनी मुस्कान को किसी भी परिस्थिति से कीमती समझना चाहिए।

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