तस्य वाचकः प्रणवः

उस ईश्वरीय चैतन्य को ॐ कह कर पुकारते हैं। ॐ चैतन्य के निकटतम है जिसे उसे पुकारने के लिए प्रयुक्त कर सकते हैं। जब तुम ॐ का नाद करते हो तब प्राण और चैतन्य पूर्ण होता है। ‘आ’ का स्पंदन शरीर के निचले हिस्से में, ‘उ’ का स्पंदन मध्यम शरीर में और ‘म’ का स्पंदन ऊपरी हिस्से में होता है। 

ॐ एक विशेष ध्वनि है जो चैतन्य की पूर्णता को पुकारने के लिए निकटतम है। ‘अमीन’ भी ॐ का ही विकृत रूप है। ॐ को किसी ना किसी रूप में सभी धर्मों में स्वीकार किया जाता है। बुद्ध, जैन, इस्लाम और ईसाई धर्मों में या तो ॐ अथवा कोई ऐसी ध्वनि जो ॐ के निकट है, उसे पवित्र माना गया है। ॐ उस चैतन्य के निकटतम है और बाकी सभी शब्द कहीं कहीं परिधि पर उसके आसपास हैं। 

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जप क्या है?

तज्जपस्तदर्थभावनम्

यह भी एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है। जप क्या है? ऐसी ध्वनि जो तुम्हें चेतना की उस अवस्था अथवा भाव को याद दिलाती है। जैसे तुम यदि ‘आम’ बोलते हो तो आम कहते ही तुम्हारे भीतर उसका आकार और भाव आता है और यदि तुम्हे आम पसंद है तो तुम्हारे मुँह में पानी भी आ सकता है। आम कहते ही तुरंत यह प्रक्रिया शुरू हो जाती है। ऐसे ही दीवाली कहते ही आपके मन में उत्सव और प्रकाश का भाव आता है। 

ऐसे ही ॐ का जप करते ही उस पूर्ण चैतन्य को याद करते हैं, एसा चैतन्य जो तुम्हारे अस्तित्त्व का केंद्र है। ऐसा चैतन्य जो दुखों से मुक्त है और प्रेम स्वरुप है। ॐ की ध्वनि तुम्हें उस चेतना का स्मरण कराती है।

ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च॥

जप का प्रयोग क्या है?

जब चैतन्य में पूर्णता का भाव उभरता है तब साक्षी भाव प्रबल हो जाता है और चेतना पूरी तरह से परिवर्तित होकर एक अलग ही प्रकार से खिल उठती है। सोच विचार में स्पष्टता आती है। भाव में स्पष्टता आती है। पूरा शरीर भी एक बदलाव से गुजरता है, तुम अधिक जीवंत और प्राण शक्ति से भर जाते हो। तुम्हारे योग के रास्ते की सारी बाधाएँ हट जाती हैं। 

उस आधिपत्य, ईश्वरीय चेतना का स्मरण मात्र ही तुम्हारे रास्ते की सभी बाधाओं को हटा सकता है। 

यह बाधाएँ कौनसी हैं?

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गुरुदेव का कालातीत ज्ञान

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ॐ पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

ॐ एक  पवित्र ध्वनि है जो ईश्वरीय चैतन्य का प्रतीक मानी जाती है। योग दर्शन के अनुसार:
तस्य वाचकः प्रणवः अर्थात् उस परम चेतना का सूचक शब्द “प्रणव” (ॐ) है।
ॐ वह ध्वनि है जो संपूर्ण अस्तित्व और चेतना की पूर्णता को व्यक्त करती है।
ॐ उस चैतन्य के निकटतम ध्वनि है जिसे हम ईश्वर, परम चेतना या सार्वभौमिक ऊर्जा कहते हैं। जब हम ॐ का उच्चारण करते हैं, तब प्राण शक्ति और चेतना में जागरण होता है।
यह ध्वनि तीन भागों से बनी है:
1. ‘अ’ – शरीर के निचले भाग में स्पंदन
2. ‘उ’ – मध्य भाग में स्पंदन
3. ‘म’ – ऊपरी भाग में स्पंदन
इन तीनों की सम्मिलित कंपन पूरे शरीर और चेतना को संतुलित करती है।
हाँ, ॐ को विभिन्न धर्मों में अलग अलग रूपों में पवित्र माना गया है।
1. बौद्ध और जैन परंपरा में “ॐ”
2. इस्लाम में “आमीन”
3. ईसाई धर्म में “आमेन”
इन ध्वनियों को ॐ से निकट माना जाता है।
तज्जपस्तदर्थभावनम्
जप का अर्थ है — किसी पवित्र ध्वनि का बार-बार स्मरण और उच्चारण, जिससे उसका भाव जागृत हो।
जैसे “दीवाली” शब्द सुनते ही उत्सव और प्रकाश की भावना आती है, वैसे ही ॐ का जप करते ही पूर्ण चैतन्य का स्मरण होता है।
योग सूत्र के अनुसार:
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च अर्थात् ॐ जप से:
1. साक्षी भाव प्रबल होता है
2. मन और भाव में स्पष्टता आती है
3. शरीर में ऊर्जा और प्राण शक्ति बढ़ती है
4. योग मार्ग की बाधाएँ कम होती हैं
5. मानसिक तनाव और अशांति घटती है
योग दर्शन में प्रमुख बाधाएँ (अंतराय) इस प्रकार बताई गई हैं:
1. रोग 
2. आलस्य
3. संशय
4. प्रमाद
5. अस्थिरता
6. नकारात्मक भाव
7. चित्त की अशांति
ॐ का नियमित जप इन बाधाओं को कम करने में सहायक माना गया है।
1. शांत स्थान पर बैठें
2. रीढ़ की हड्डी सीधी रखें
3. गहरी साँस लें
4. लंबा “ॐ” उच्चारण करें
5. कंपन को पूरे शरीर में महसूस करें
शुरुआत में 5–10 मिनट पर्याप्त हैं।
अध्ययन बताते हैं कि ॐ जप से:
1. मस्तिष्क की अल्फा वेव सक्रिय होती हैं
2. तनाव हार्मोन कम होते हैं
3. हृदय गति संतुलित होती है
नियमित अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है।

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