व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥

योग के पथ पर चलते हुए नौ तरह की बाधाएं, विक्षेप आ सकते हैं।

1. व्याधि

शारीरिक बीमारी, यह योग के पथ में पहली बाधा है।

2. स्त्यान

मानसिक बीमारी, मन से विक्षिप्त होना अथवा सुनने, समझने और मानने की क्षमता न होना स्त्यान है।  

कई बार ऐसा होता है की साधारणतः आप सही रहते है पर जैसे ही आप किसी ध्यान शिविर में आते है तो आप बीमार हो जाते है, ऐसे ही कभी आप ध्यान करने बैठते हैं तब शरीर दुखने लगता है, बैचेनी होती है।  सिनेमा देखने में ऐसा कतई नहीं होता।  यह भी एक तरह की बाधा ही है।

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3. संशय

संशय अर्थात संदेह, मन में तीन तरह के संशय आ सकते है।

स्वयं पर संशय :  अपने ऊपर संशय जैसे “क्या मैं उतना अच्छा हूँ? क्या मैं इतना कर सकता हूँ? मुझे नहीं लगता मैं ये कर सकता हूँ।  इसी प्रकार किसी ध्यान शिविर में और सभी को अच्छे से ध्यान करता देख कर भी यह सोच सकते हो की मैं ही परेशान हूँ, मेरा ही ध्यान नहीं लग रहा है, बाकी सब ध्यान कर पा रहे हैं। मुझे लगता है की मैं तो कभी भी ध्यान नहीं कर पाउँगा।

योग के मार्ग पर इस प्रकार के संशय उठ सकते है।

ध्यान प्रक्रिया पर संशय: “क्या यह ध्यान प्रक्रिया ठीक भी है? इससे कोई फायदा होगा मुझे? हो सकता है मेरे लिए कोई और प्रक्रिया ठीक हो।” ऐसे सभी संशय भी मन को परेशान कर सकते हैं। 

गुरु पर संशय: गुरु पर भी कई तरह के संशय उठ सकता है जैसे कि “ये गुरूजी स्वयं क्या करते है? इन्हें मुझसे क्या चाहिए होगा?” ऐसे सभी संशय भी हो सकते हैं

इस तरह के तीन संशय पथ पर प्रगति में बाधक बन सकते है। 

तुम्हें संशय को अच्छे से समझना होगा। संशय हमेशा अच्छे पर, सकारात्मक पर ही होता है।  तुम्हें कभी भी नकारात्मक पर संशय नहीं होता है। तुम्हें अवसाद पर संशय नहीं होता, तुम्हें अपनी प्रसन्नता पर संशय होता है।

4. प्रमाद

यह जानते हुए भी की कुछ बहुत गलत है, फिर भी वही करना प्रमाद है। तुम्हें पता हो कि यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है फिर भी तुम वही करते रहते हो, इसे प्रमाद कहते है। इसी तरह तुम्हे अच्छे से पता हो की तुम्हे कुछ करना है और तुम फिर भी वह न करो। 

यह जानते हुए की कुछ जरूरी है, फिर भी वह ना करना प्रमाद है। तुम्हे अच्छे से पता है की तुम्हे टैक्स देना है पर फिर भी तुम कर न चुकाओ, यही प्रमाद है। तुम्हें जानकारी है कि यदि तुम कुछ काम नहीं करोगे तो संकट में पड़ जाओगे फिर भी वह काम नहीं करना प्रमाद है।  जैसे यदि तुम बीमार हो और तुम्हे मीठा खाने का मना हो, फिर भी तुम मीठा खाओ, वह प्रमाद है। इस तरह से लापरवाही बरतना और सजगता न बनाये रखना भी एक बाधा है।

5. आलस्य

आलस्य अर्थात शरीर की जड़ता। ऐसा भी हो सकता है की आप बहुत कुछ करते हो पर जब योग, आसन और प्राणायाम करने के समय पर मन नही करता, इस तरह का आलस्य जीवन के किसी भी क्षेत्र में हो सकता है। 

प्रमाद में तुम जानबूझकर कुछ नहीं करते हो पर आलस्य में शरीर की जड़ता तुम्हें कुछ नहीं करने देती है।

6. अविरति

किसी भी इंद्रिय विषय-वस्तु में फंसे रहना और उससे बाहर न निकलना अविरति है।  जैसे तुम्हें भूख लगी हो तब तुम भोजन करो परन्तु पूरे दिन यदि भोजन के बारे में ही सोचते रहो तब यह अविरति है।

ऐसे ही तुम्हें कुछ सुन्दर प्राकृतिक दृश्य देखने का मन हो तो, देखो और खत्म करो।  हमेशा कुछ देखने के बारे में ही सोचते रहना निरर्थक है। 

हमारी इन्द्रियों का जो क्रिया कलाप है वह कुछ सीमित समय के लिए होना चाहिए और फिर वह समाप्त हो जाना चाहिए। परन्तु ऐसे किसी भी इन्द्रिय क्रिया कलाप को लगातार करते रहना या चौबीस घंटे उसी के बारे में सोचते रहना अविरति है। 

तुम भोजन करो पर उसके बाद भोजन के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है।  ऐसे ही तुम सम्भोग भी करो तो उसे पूरे दिन मन में लेकर घूमने की आवश्यकता नहीं है। ऐसे किसी भी इंद्रिय क्रिया कलाप से अपने आपको अलग न कर पाना अविरति है। 

लोग दिन रात अश्लील सिनेमा देखते हैं, शरीर चाहे वीर्यहीन हो परन्तु मन उसी कामभावना से ग्रस्त रहता है , इसी के बारे में सोचते रहते हैं, यही अविरति है। यह एक बड़ी बाधा है, किसी भी इंद्रिय सुख को पूर्ण रूप से न भोग पाना और उससे ग्रस्त रहना, उससे मुक्त न हो पाना अविरति है। 

अविरति तुम्हें केंद्रित नहीं होने देती, मन को इधर उधर खींचती रहती है। 

7. भ्रान्ति दर्शन

भ्रान्ति दर्शन अर्थात दृष्टि भ्रम, कभी किसी को लगे कि वह कोई विशेष व्यक्ति है। कोई अपने आप को सिद्ध समझने लगे। 

कई बार लोगों  के साथ ऐसा होता है कि ध्यान साधना के दौरान उन्हें कुछ दृश्य दिखते हैं, कुछ अनुभव होते हैं पर वो उनमें फंस जाते हैं ।  ऐसे अनुभव न पूर्णतः सत्य होते हैं  न पूर्णतः मिथ्या। 

भ्रान्ति दर्शन की वजह से विश्व भर में न जाने कितने पंथ, सम्प्रदाय बने हैं , लोग यह समझ ही नहीं पाते कि यह योग के पथ की बाधा मात्र है। इसे योगमाया भी कहते हैं । 

कभी तुम ध्यान में बैठे हो, तब योगमाया में कुछ दृश्य दिखता है और तुम्हें कुछ सन्देश देता है। जैसे तुम्हें अंतर्ज्ञान से ही ध्यान में आया कि दरवाजा खोलो, कोई तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है। यह सन्देश तुम्हारे भीतर अंतर्ज्ञान से आता है और सही भी होता है, कोई वास्तव में तुम्हारा इंतज़ार कर रहा होता है। ऐसा देख कर तुम उत्साहित हो जाते हो। तुम्हें लगेगा जीसस या गुरूजी आये और उन्होंने मुझे यह सन्देश दिया, फिर दूसरे दिन, तीसरे दिन भी तुम्हारे सन्देश सत्य निकलेंगे। पर किसी समय यह भी होगा कि तुम्हारे भय, इच्छाएं, द्वेष और इधर उधर की मन की छापें भी जीसस और गुरूजी का सन्देश का रूप लेकर आएँगी और तुम उनको सत्य मानकर दुःख पाओगे। 

एक बार ऐसा हुआ कि हमारे यहाँ एक शिक्षक को पहले ही आभास हो जाता था और लगभग हमेशा सत्य ही होता था। एक बार उन्हें लगा कि उनके बीमार पति को हॉस्पिटल ले जाने की आवश्यकता नहीं है वह ऐसे ही ठीक हो जायेंगे।  ऐसे सोचकर उन्होंने अपने पति को कोई दवाई नहीं दी और उनकी शुगर इतनी बढ़ गयी कि वह दृष्टिहीन हो गए। उन शिक्षक को पहले से ही अपने पति को हॉस्पिटल ले जाने में भय लगता था, इसीलिए वही भय उनको सन्देश का रूप लेकर आया। फिर वह शिक्षिका अपने आप को कोसती रही कि क्यों उनकी अंदर की आवाज ने उन्हें धोखा दिया।

जब तक इस बात की सही समझ नहीं होगी और जब तक तुम पूरी तरह से खाली और शुद्ध नहीं होते, तब तक ऐसी संभावना बनी रहती है। हो सकता है तुम्हें होने वाले आभास सत्तर प्रतिशत सही भी हो क्योंकि चित्त में उतनी शुद्धता है परन्तु तीस प्रतिशत तुम्हारे डर, इच्छाएं और  पुरानी छापें भी इसी तरह आ सकती हैं । बहुत लोग इसमें फंस जाते हैं।

भ्रान्ति दर्शन योग के पथ पर एक बड़ी बाधा है।  

8. अलब्धभूमिकत्व

कभी कभी लोग 9-10 वर्ष से साधना कर रहे होते हैं पर उन्हें कुछ अनुभव नहीं हो रहे होते, वही विचार आते रहते हैं और कोई अवस्था प्राप्त नहीं होती। कोई शान्ति अथवा समाधि की अवस्था भी प्राप्त नहीं होती, इस बाधा को अलब्धभूमिकत्व कहते हैं। 

ऐसे में लोगों को लगता है कि वो कहीं अटक गए हैं और उनकी कोई प्रगति नहीं हो रही है परन्तु ऐसे में भी वह उस साधना या ध्यान की तकनीक को नहीं छोड़ते हैं। 

9. अनावस्थितत्व

अनावस्थितत्व अर्थात अस्थिरता, इसमें तुम्हें कुछ अच्छे अनुभव होते हैं, शान्ति का अनुभव होता है परन्तु वह टिकता नहीं है।  अनावस्थितत्व में योग के मार्ग पर आनंद की अनुभूति होती है पर वह तुरंत ही क्षीण हो जाती है।

 “मुझे सजगता, शान्ति और जागरूकता का अनुभव होता है पर वह कुछ ही क्षणों के लिए रहता है। मैं ध्यान शिविर से प्रसन्न होकर निकलता हूँ पर वह कुछ ही दिनों में खत्म हो जाती है।” यह लोगों की एक सामान्य शिकायत रहती है।  

इस तरह किसी अवस्था में न टिक पाना, अनावस्थितत्व है। 

इन नौ बाधाओं और विक्षेपों के अलावा और कुछ संभावना नहीं है, कोई और बाधा है ही नहीं। महर्षि पतंजलि मन के ऐसे महान वैज्ञानिक हुए जिन्होंने ऐसे गहनतम ज्ञान को इतने कम शब्दों में संजोया है।

योग की बाधाओं में अटकने के क्या लक्षण हैं? उनके पार पाने का उपाय क्या है? जानने के लिए पढ़िए

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योग के पथ की नौ बाधाएँ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

महर्षि पतंजलि के अनुसार, योग के पथ पर नौ मुख्य विक्षेप या बाधाएँ आती हैं:
1. व्याधि (शारीरिक रोग)
2. स्त्यान (मानसिक जड़ता)
3. संशय (संदेह)
4. प्रमाद (लापरवाही)
5. आलस्य (शारीरिक भारीपन)
6. अविरति (इंद्रिय विषयों में फँसे रहना)
7. भ्रान्ति दर्शन (मृगतृष्णा या गलत धारणा)
8. अलब्धभूमिकत्व (अवस्था प्राप्त न होना)
9. अनवस्थितत्व (अस्थिरता)
व्याधि का अर्थ है शरीर की बीमारी, जो साधना में बैठने नहीं देती। वहीं स्त्यान एक मानसिक बीमारी है, जहाँ मन सुनने या समझने की क्षमता खो देता है। कई बार व्यक्ति सामान्यतः ठीक रहता है, लेकिन ध्यान के समय ही उसे बेचैनी या शरीर में दर्द महसूस होने लगता है, यह ‘स्त्यान’ का ही एक रूप है।
साधक के मन में अक्सर ये तीन संदेह बाधा बनते हैं:
1. स्वयं पर संशय: “क्या मैं यह कर पाऊँगा? क्या मैं इसके योग्य हूँ?”
2. प्रक्रिया पर संशय: “क्या यह तकनीक (जैसे सुदर्शन क्रिया) मेरे लिए सही है?”
3. गुरु पर संशय: “गुरु की मंशा क्या है? उन्हें मुझसे क्या चाहिए?”
विशेष सूत्र: संशय हमेशा सकारात्मक चीजों पर ही होता है, नकारात्मक पर नहीं (जैसे हमें अपनी प्रसन्नता पर संशय होता है, अवसाद पर नहीं)।
प्रमाद (Carelessness): इसमें आप जानते हैं कि क्या सही है, फिर भी लापरवाहीवश वह नहीं करते (जैसे सेहत खराब होने पर भी मीठा खाना)।
आलस्य (Laziness)यह शरीर की जड़ता है, जहाँ शरीर में भारीपन के कारण योग या प्राणायाम करने का मन ही नहीं करता।
जब मन निरंतर इंद्रिय सुखों (भोजन, कामवासना, दृश्य) के बारे में ही सोचता रहता है, तो उसे ‘अविरति’ कहते हैं। इंद्रियों का आनंद सीमित समय के लिए होना चाहिए, लेकिन चौबीस घंटे उसी में उलझे रहना मन को केंद्र से भटका देता है और साधना को कठिन बना देता है।
साधना के दौरान कई बार साधक को कुछ दृश्य या आभास होते हैं जिन्हें वह ‘ईश्वरीय संदेश’ मान लेता है। यह 70% सही हो सकते हैं, लेकिन 30% इसमें हमारे अपने डर और इच्छाएँ मिली होती हैं। बिना शुद्ध चित्त के इन अनुभवों में फँस जाना भ्रान्ति दर्शन है, जो अहंकार बढ़ा सकता है और पथ से भटका सकता है।
अलब्धभूमिकत्व: लंबे समय तक साधना करने के बाद भी जब कोई विशेष शांति या अनुभव प्राप्त नहीं होता, तो साधक को लगता है कि वह कहीं अटक गया है।
अनावस्थितत्व: इसमें अनुभव तो होते हैं, लेकिन वे टिकते नहीं। साधक शिविर से प्रसन्न होकर निकलता है, पर कुछ ही दिनों में वह शांति लुप्त हो जाती है।

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