भगवान श्री कृष्ण का जन्म एक गूढ़ रहस्य है

हमारी प्राचीन कहानियों का सौंदर्य यह है कि वे कभी भी विशेष स्थान या विशेष समय पर नहीं बनाई गई हैं। रामायण या महाभारत प्राचीन काल में घटी घटनाएँ मात्र नहीं हैं। यह हमारे जीवन में प्रतिदिन घटती हैं। इन कहानियों का सार शाश्वत है।

श्री कृष्ण जन्म की कहानी का भी गूढ़ अर्थ है। इस कहानी में देवकी शरीर की प्रतीक हैं और वासुदेव जीवन शक्ति अर्थात प्राण के। जब शरीर प्राण धारण करता है, तो आनंद अर्थात श्री कृष्ण का जन्म होता है। लेकिन अहंकार (कंस) आनंद को नष्ट करने का प्रयास करता है। यहाँ देवकी का भाई कंस यह दर्शाता है कि शरीर के साथ-साथ अहंकार का भी अस्तित्व होता है। एक प्रसन्न एवं आनंदचित्त व्यक्ति कभी किसी के लिए समस्याएँ नहीं खड़ी करता है, परन्तु भावनात्मक रूप से दुखी व्यक्ति अक्सर दूसरों को दुखी करते हैं, या उनकी राह में अवरोध पैदा करते हैं। जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके साथ अन्याय हुआ है, वह अपने अहंकार के कारण दूसरों के साथ भी अन्यायपूर्ण व्यवहार करता है।

अगले तीन वर्षों के लिए श्री कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव किस दिन है?

  • 16 अगस्त 2025 शनिवार 
  • 4 सितंबर 2026  शुक्रवार 
  • 25 अगस्त 2027 बुधवार

जहाँ आनंद और प्रेम है, वहाँ अहंकार टिक नहीं सकता

अहंकार का सबसे बड़ा शत्रु आनंद है। जहाँ आनंद और प्रेम है ,वहाँ अहंकार टिक नहीं सकता है, उसे झुकना ही पड़ता है। समाज में एक बहुत ही उच्च स्थान पर विराजमान व्यक्ति को भी अपने छोटे बच्चे के सामने झुकना पड़ जाता है। जब बच्चा बीमार हो, तो कितना भी मजबूत व्यक्ति हो, वह थोड़ा असहाय महसूस करने ही लगता है। प्रेम, सादगी और आनंद के साथ सामना होने पर अहंकार स्वतः ही आसानी से ओझल होने लगता है। श्री कृष्ण आनंद के प्रतीक हैं, सादगी के सार हैं और प्रेम के स्रोत हैं।

जब अहंकार बढ़ जाता है, तब शरीर एक जेल की तरह हो जाता है

कंस के द्वारा देवकी और वासुदेव को कारावास में डालना इस बात का सूचक है कि जब अहंकार बढ़ जाता है, तब शरीर एक जेल की तरह हो जाता है। जब श्री कृष्ण का जन्म हुआ था, तब जेल के पहरेदार सो गए थे। यहाँ पहरेदार वह इन्द्रियाँ हैं, जो अहंकार की रक्षा कर रही हैं क्योंकि जब वह जागता है, तो बहिर्मुखी हो जाता है। जब यह इन्द्रियाँ अंतर्मुखी होती हैं, तब हमारे भीतर आंतरिक आनंद का उदय होता है।

यह समाज में खुशी की एक लहर लाने का समय है – यही जन्माष्टमी का संदेश है। गंभीरता के साथ आनंदपूर्ण बनें।

– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

श्री कृष्ण को ‘माखन चोर’ क्यों कहा जाता है?

श्री कृष्ण माखनचोर के रूप में भी जाने जाते हैं। दूध पोषण का सार है और दूध का एक परिष्कृत रूप दही है। जब दही का मंथन होता है, तो मक्खन बनता है और ऊपर तैरता है। यह भारी नहीं बल्कि हल्का और पौष्टिक भी होता है। जब हमारी बुद्धि का मंथन होता है, तब यह मक्खन की तरह हो जाती है। तब मन में ज्ञान का उदय होता है, और व्यक्ति अपने स्व में स्थापित हो जाता है। दुनिया में रहकर भी वह अलिप्त रहता है, उसका मन दुनिया की बातों से/ व्यवहार से निराश नहीं होता। माखनचोरी श्री कृष्ण प्रेम की महिमा के चित्रण का प्रतीक है। श्री कृष्ण का आकर्षण और कौशल इतना है कि वह सबसे संयमशील व्यक्ति का भी मन चुरा लेते हैं।

भगवान कृष्ण के सिर पर मोरपंख जिम्मेदारियों का प्रतीक है

एक राजा अपनी पूरी प्रजा के लिए जिम्मेदार होता है। वह मुकुट के रूप में इन जिम्मेदारियों का बोझ अपने सिर पर धारण करता है। लेकिन,  श्री कृष्ण अपनी सभी जिम्मेदारियां बड़ी सहजता से पूरी करते हैं – एक खेल की तरह। जैसे किसी माँ को अपने बच्चों की देखभाल कभी बोझ नहीं लगती। श्री कृष्ण को भी अपनी जिम्मेदारियाँ बोझ नहीं लगतीं हैं और वे विविध रंगों भरी इन जिम्मेदारियों को बड़ी सहजता से एक मोरपंख (जो कि अत्यंत हल्का भी होता है) के रूप में अपने मुकुट पर धारण किए हुए हैं।

श्री कृष्ण हम सबके भीतर एक आकर्षक और आनंदमय धारा हैं। जब मन में कोई बेचैनी, चिंता या इच्छा न हो, तब ही हम गहरा विश्राम पा सकते हैं और गहरे विश्राम में ही श्री कृष्ण का जन्म होता है।

गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर द्वारा दी गई ज्ञान वार्ता से संकलित।

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कृष्ण जन्माष्टमी पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

आर्ट ऑफ लिविंग के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रतीक है। गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर कहते हैं, जब हमारा मन शांत होता है और इन्द्रियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं, तब हमारे भीतर गहरे विश्राम में ‘आनंद’ (कृष्ण) का जन्म होता है। जन्माष्टमी का संदेश है – जीवन में गंभीरता के साथ-साथ आनंदपूर्ण बने रहना।
इस कथा के पात्र हमारे शरीर और मन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं:
देवकी: शरीर का प्रतीक हैं।
वसुदेव: जीवन शक्ति या ‘प्राण’ का प्रतीक हैं।
कंस: अहंकार का प्रतीक है। जब शरीर (देवकी) और प्राण (वसुदेव) का मिलन होता है, तब आनंद (कृष्ण) का जन्म होता है। लेकिन अहंकार (कंस) उस आनंद को खत्म करने की कोशिश करता है।
श्री कृष्ण को ‘माखन चोर’ कहने के पीछे गहरा दार्शनिक अर्थ है:
मक्खन (ज्ञान): जैसे दूध को मथने से हल्का और पौष्टिक मक्खन ऊपर आता है, वैसे ही जब हमारी बुद्धि का मंथन होता है, तो ज्ञान रूपी मक्खन प्रकट होता है।
मन की चोरी: श्री कृष्ण का आकर्षण इतना प्रबल है कि वे सबसे संयमशील व्यक्ति का भी मन चुरा लेते हैं। वे भक्त के अहंकार और चित्त को चुराकर उसे अपने ‘स्व’ में स्थित कर देते हैं।
श्री कृष्ण के सिर पर मोरपंख जिम्मेदारियों को सहजता से निभाने का प्रतीक है। जैसे राजा अपने सिर पर जिम्मेदारियों का भारी मुकुट पहनता है, वहीं श्री कृष्ण अपनी सारी जिम्मेदारियों (जो मोरपंख के कई रंगों की तरह विविध हैं) को बिना किसी बोझ के, खेल-खेल में और अत्यंत हल्केपन से धारण करते हैं।
जेल के पहरेदार उन इन्द्रियों के प्रतीक हैं जो अहंकार (कंस) की रक्षा करती हैं। जब इन्द्रियाँ जागती हैं, तो वे बाहर की ओर भागती हैं (बहिर्मुखी होती हैं)। श्री कृष्ण (आनंद) का जन्म तभी संभव है जब ये इन्द्रियाँ सो जाएँ अर्थात् अंतर्मुखी हो जाएँ। पहरेदारों का सो जाना इसी अंतर्मुखी अवस्था का सूचक है।
यह दर्शाता है कि जब जीवन में अहंकार (कंस) बढ़ जाता है, तो हमारा शरीर और आत्मा एक ‘जेल’ के समान महसूस करने लगते हैं। जब अहंकार मिटता है और प्रेम का उदय होता है, तभी हम इस बंधन से मुक्त होकर सच्चा उत्सव मना पाते हैं।

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