जब कभी पृथ्वी कुछ क्षण मात्र के लिए हिलती है, तब भयंकर आपदा आती है। हम इस पृथ्वी पर इसलिए रह पाते हैं क्योंकि यह स्थिर है। कभी कभार पृथ्वी एक क्षण के लिए हिलती भर है और सब कुछ उखाड़ फेंकती है, कुछ क्षण में ही तुम्हारा जीवन कई दिनों के लिए थम जाता है।

जब भी कहीं कोई प्राकृतिक आपदा आती है, बाढ़, भूकंप, अत्यधिक गर्मी अथवा सर्दी, यह सब जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। तुम तब ही शान्ति से रह सकते हो, जब प्रकृति शांत और स्थिर हो । 

प्रकृति कभी-कभार अनियंत्रित होती है, पर तुम्हारी इन्द्रियाँ हर रोज अनियंत्रित होती हैं। जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित हों, तब वे अपने भीतर उस ईश्वरीय चेतना को नहीं संभाल पाती हैं, भीतर की शान्ति भंग हो जाती है। जैसे प्रकृति के स्थिर होने से बाहर शान्ति बनी रहती है वैसे ही इन्द्रियों के स्थिर और शांत होने से भीतर की शान्ति बनी रहती है। जब प्रकृति संतुलित हो और इन्द्रियों में सामंजस्य हो, तब ही ध्यान घट सकता है।

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ध्यान के दौरान तुम्हारी आँखें भी स्थिर होती हैं, यदि आँखें चारों तरफ लालायित हो घूम रही हों तब वह ध्यानस्थ अवस्था नहीं है। ध्यान करते समय तुम्हें यह परखना चाहिए कि क्या तुम्हारी आँखें स्थिर हैं, क्या श्वास का आवागमन संतुलित है और क्या प्राणशक्ति तितर बितर बिखरी हुई है अथवा संगठित है? जब इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं तब आत्मा को भी शान्ति मिलती है, तुम्हारे भीतर भी एक स्थिरता आती है। 

इन्द्रियाँ अनियंत्रित कब हो उठती हैं?

जब इन्द्रियों को ऐसा लगता है कि आनंद, जो कि आत्मा का स्वभाव है, भीतर न हो कर बाहर की विषय वस्तुओं में अधिक है।

इन्द्रियाँ बीच के सेतु के समान हैं, एक ओर विषय वस्तुओं का संसार है और दूसरी ओर आत्मा। जब इन्द्रियों को लगता है कि उन्हें अधिक सुख विषय वस्तुओं से  मिलेगा, तब वह विचलित हो उठती हैं। यदि कुछ मिनटों के लिए भी इन्द्रियाँ विचलित होती हैं, तो वे तुरंत ही थक जाती हैं और आनंद को अनुभूति तक करने के लिए विषम बन जाती हैं।

क्या तुम यह समझ रहे हो?

थोड़े दिन पहले मेरा एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय में जाना हुआ। जहाँ 175 नेत्रहीन विद्यार्थियों के साथ भजन सत्संग का कार्यक्रम रखा गया था। हम सभी भक्तों के साथ एक बस भर कर वहाँ गए। वहाँ पर उन नेत्रहीन विद्यार्थियों ने ऐसी तन्मयता के साथ, पूरे हृदय से भजन गाये कि हमारे साथ में जाने वाले लोग भी कहने लगे कि इतना अद्भुत भजन सत्संग शायद ही उन्होंने कभी अनुभव किया हो। उन बच्चों के सत्संग में विशेष शक्ति थी क्योंकि उनके लिए विकर्षण की कोई संभावना नहीं थी, वह व्याकुलता से इधर उधर नहीं देख सकते थे। ऐसा लग रहा था जैसे वे सभी किसी गहरी ध्यानस्थ अवस्था से गा रहे हो, उन्होंने अपने आप को उन भजनों में पूरी तरह से डुबो लिया था। क्योंकि उनकी आंखें स्थिर थीं, वे इधर उधर नहीं हो सकती थीं, ऐसे में मन भी आसानी से ठहर गया था। 

तुम जिन आँखों को अपना पथ प्रदर्शक समझते हो, जो तुम्हें सब कुछ दिखाती हैं, वही आँखें तुम्हें विचलित भी करती हैं, क्योंकि आँखें ही तुम्हारे लिए सब तरह के प्रलोभन प्रस्तुत करती हैं। तुम कल्पना में लगे रहते हो, यह सुन्दर है, यह ज्यादा सुन्दर है, यह अच्छा है, बुरा है। मन बिना आँखों के कहीं अधिक शांत होता। स्वयं में स्थिरता लाने में सबसे बड़ा रोड़ा आँखें ही हैं। तुम्हें प्रलोभित करने के लिए किसी शैतान की आवश्यकता ही नहीं, तुम्हारी आँखें ही पर्याप्त हैं। किसी ने यह भी कहा है कि ईश्वर मुझे कोई प्रलोभन न देना, मैं अपना प्रलोभन स्वयं खोज लूँगा। आँखें इसी तरह अपने प्रलोभन ढूंढ़ती रहती हैं।    

कानों के साथ भी ऐसा ही है, कभी कभी लोग रेडियो सुनते हुए बार बार अलग अलग स्टेशन लगाते ही रहते हैं।  मैं एक ऐसे व्यक्ति को भी जानता हूँ जो रेडियो चलाएँगे पर किसी को एक भी गाना पूरा नहीं सुनने देंगे। कुछ ही सेकण्ड्स में वे चैनल बदलकर दूसरे किसी बेहतर कार्यक्रम को ढूंढ़ते ही रहेंगे।  पूरा समय ऐसे ही रेडियो के चैनल बदलने में ही व्यतीत हो जाता है।  उन्हें लगता है कि शायद किसी और स्टेशन पर कोई और अच्छा कार्यक्रम आ रहा हो। 

यह सुनने में बहुत अजीब है, पर मन ऐसे ही करता है। ऐसा ही कुछ लोगों के साथ सुगंध, स्पर्श और स्वाद के लिए भी हो सकता है।

जब इन्द्रियाँ स्थिर होती हैं तब भीतर बिखरी हुई प्राणशक्ति भी सीधी हो उठती है। तुमने प्राणायाम करते हुए यह परखा होगा कि कैसे बिखरी हुई प्राणशक्ति एकत्रित हो कर स्थिर हो जाती है। जब भी तुम नाखुश हो, परेशान हो, भयभीत और व्यथित हो, तब प्राणशक्ति को देखो।  तुम पाओगे कि यह और कुछ नहीं, बल्कि प्राणशक्ति की अस्थिरता मात्र है। समाधि का अर्थ है प्राण का स्थिर हो जाना। 

अब बिखरे हुए प्राण शक्ति को देख कर तुम ये चिंता में पड़ कर उतावले न हो जाना कि अरे, प्राण पूरा बिखरा हुआ है। प्राण के प्रति सजगता मात्र से ही प्राणशक्ति स्थिर और अविचल होने लगती है। इस तरह तुम केंद्रित हो फिर अपने व्योमवत स्वभाव में आ जाते हो। 

पतंजलि कहते हैं कि समाधि में तुम स्फटिक से हो जाते हो। जैसे स्फटिक होते हुए भी पूरी तरह से अपने आर-पार प्रकाश को जाने देता है उसी तरह तुम शरीर में होने के बाद भी वहाँ पर नहीं भी होते हो। तुम ऐसे रहते हो जैसे तुम हो ही नहीं, यही समाधि है। 

जब तुम अपने साथ हो, तब पूरी तरह से अपने साथ स्थिर, मुक्त और प्रसन्नचित्त रहो। जब तुम संसार में इन्द्रियों के साथ हो, तब पूरी तरह से इन्द्रियों के साथ ही रहो और जब विषय वस्तुओं के साथ हो तब उन्हीं में विलय हो जाओ। जैसे एक स्फटिक से जिस भी रंग का प्रकाश निकलें, स्फटिक निर्विरोध उसी रंग का दिखने लगता है बिलकुल उसी तरह जब तुम एक पहाड़ को देखो तब तुम पहाड़ के साथ एक ही हो जाओ, तब वह समाधि है।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इन्द्रिय ध्यान का अर्थ है अपनी पाँचों इंद्रियों (दृष्टि, श्रवण, सूंघना, स्वाद और स्पर्श) को बाहरी भटकाव से हटाकर स्थिर और शांत करना। जब हमारी इंद्रियाँ संतुलित और शांत होती हैं, तभी हम समाधि की अवस्था में स्थित हो पाते हैं और अपने भीतर की ईश्वरीय चेतना का अनुभव कर पाते हैं।
जैसे पृथ्वी के स्थिर रहने पर ही जीवन शांति से चलता है, वैसे ही मन और शरीर के भीतर शांति बनाए रखने के लिए इंद्रियों का स्थिर होना आवश्यक है। यदि इंद्रियाँ अनियंत्रित रहेंगी, तो वे ईश्वरीय चेतना को ग्रहण नहीं कर पाएँगी और आंतरिक शांति भंग हो जाएगी। इसलिए, ध्यान के घटित होने के लिए इंद्रियों का सामंजस्य में होना प्राथमिक शर्त है।
प्रकृति और इंद्रियों की तुलना करते हुए बताया गया है कि जब प्रकृति असंतुलित होती है (जैसे भूकंप, बाढ़ या अत्यधिक गर्मी), तो बाहरी जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसी तरह, जब हमारी इंद्रियाँ अनियंत्रित होती हैं, तो हमारा आंतरिक जीवन (मन और चेतना) उथल पुथल हो जाता है। बाहरी शांति प्रकृति के संतुलन पर निर्भर है, और भीतरी शांति इंद्रियों के संतुलन पर।
प्रकृति तो कभी कभार अनियंत्रित होती है, लेकिन हमारी इंद्रियाँ प्रतिदिन भटकती हैं और अनियंत्रित हो जाती हैं। इसके कारण मन में तनाव, चिंता और अस्थिरता आती है। अनियंत्रित इंद्रियाँ हमारी भीतर की शांति को चुरा लेती हैं, जिससे हम समाधि का अनुभव नहीं कर पाते।
ध्यान कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे जबरदस्ती किया जाए; यह एक घटना है जो अपने आप घटती है। जब आपके आसपास की प्रकृति संतुलित होती है और आपकी अपनी इन्द्रियों के बीच पूरी तरह से सामंजस्य (Harmony) होता है, तब ही सच्चा ध्यान घटित हो सकता है।
समाधि में ठहराव का अर्थ है मन की उस गहरी शांत अवस्था में टिके रहना जहाँ इंद्रियों का कोई शोर या भटकाव नहीं होता। जब इंद्रियाँ पूरी तरह स्थिर हो जाती हैं, तब चेतना अपने स्वरूप में लौट आती है, और व्यक्ति असीम शांति व आनंद (समाधि) का अनुभव करता है।

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