माता लक्ष्मी की पूजा (जिनको धन की देवी के नाम से जाना जाता है) को बहुत आदर सम्मान से दिवाली के पर्व पर पूरे भारतवर्ष में पूजा जाता है। नारायण लक्ष्य हैं और लक्ष्मी जी उन तक पहुँचने का साधन। गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर जी ने इन आठ प्रकार के धन या अष्ट लक्ष्मी के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। यहाँ अष्ट लक्ष्मी पर मूल हिंदी वार्तालाप के अंश हैं:

आदि लक्ष्मी (Adi Lakshmi)

आपने कभी सोचा है कि आप इस दुनिया में कैसे आए हैं? आपकी उम्र क्या है? 30,40,50 साल? यह 50 साल पहले मैं कहां था? मेरा स्रोत कहां है? मेरा मूल क्या है? मैं कौन हूं? 35-40-50 वर्षों के बाद, यह शरीर नहीं रहेगा! मैं कहां जाऊंगा? मैं कहां से आया हूं? क्या मैं यहां आया हूं या हर समय यहां हूं? हमारे मूल का ज्ञान, स्रोत का ज्ञान हो जाना ही आदि लक्ष्मी है। तब नारायण बहुत पास ही है। जिस व्यक्ति को स्रोत का ज्ञान हो जाता है, वह सभी भय से मुक्त हो जाता है और संतोष और आनंद प्राप्त करता है। यह आदि लक्ष्मी है। आदि लक्ष्मी केवल ज्ञानियों के पास होती है और जिनके पास आदिलक्ष्मी हुई, समझ लो उनको भी ज्ञान हो गया।

धन लक्ष्मी (Dhana Lakshmi)

हर कोई धन लक्ष्मी के बारे में जानते ही हैं। धन की चाह से और अभाव से ही आदमी अधर्म करता है। धन की चाह के कारण कई लोग हिंसा, चोरी, धोखाधड़ी जैसे गलत काम करते हैं मगर जाग के नहीं देखते की मेरे पास है। जोर जबरदस्ती के साथ धन लक्ष्मी आती नहीं है। अगर आती भी है तो वह आनंद नहीं देती। सिर्फ दुःख ही दुःख देती है। कुछ लोग केवल धन को ही लक्ष्मी मान लेते हैं और धन एकत्रित करना अपना लक्ष्य बना लेते हैं। मरते दम तक पैसा इकट्ठा करो और बैंक में पैसा रखकर मर जाओ। धन को लक्ष्य बनाने वाले दुःखी रह जाते हैं। कुछ लोग होते हैं जो धन को दोषी ठहराते है। पैसा नहीं है यह ठीक हैं, पैसा अच्छा नहीं है। पैसे से यह खराब हुआ, यह सभी गलतफहमी है। धन का सम्मान करो, सदुपयोग करो, तब धन लक्ष्मी ठहरती हैं। लक्ष्मी की तरह उसकी पूजा करो। कहते हैं, लक्ष्मी बड़ी चंचल होती है यानी वह चलती रहती है। चली तो उसका मूल्य हुआ। चलती नहीं है, बंद रहती है तो फिर उसका कोई महत्व नहीं है। इसलिए धन का सदुपयोग करो, सम्मान करो।

विद्या लक्ष्मी (Vidya Lakshmi)

यदि आप लक्ष्मी और सरस्वती के चित्र देखते हैं तो आप देखेंगे कि लक्ष्मी को ज्यादातर कमल में पानी के उपर रखा है। पानी अस्थिर है यानी लक्ष्मी भी पानी की तरह चंचल है। विद्या की देवी सरस्वती को एक पत्थर पर स्थिर स्थान पर रखा है। विद्या जब आती है तो जीवन में स्थिरता आती है। विद्या का भी हम दुरुपयोग कर सकते हैं। सिर्फ पढ़ना ही किसी का लक्ष्य हो जाए तब भी वह विद्या लक्ष्मी नहीं बनती। पढ़ना है, फिर जो पढ़ा है उसका उपयोग करना है तब वह विद्या लक्ष्मी है।

धान्य लक्ष्मी (Dhanya Lakshmi)

धन लक्ष्मी हो सकती है मगर धान्य लक्ष्मी भी हो यह ज़रूरी नहीं। धन तो है मगर कुछ खा नहीं सकते – रोटी, घी, चावल, नमक, चीनी खा नहीं सकते। इसका मतलब धन लक्ष्मी तो है मगर धान्य लक्ष्मी का अभाव है। गाँवों में आप देखें खूब धान्य होता है। वे किसी को भी दो-चार दिन तक खाना खिलाने में संकोच नहीं करते। धन भले ही ना हो पर धान्य होता है। गाँवों में लोग खूब अच्छे से खाते भी हैं और खिलाते भी हैं। शहर के लोगों की तुलना में ग्रामीणों द्वारा खाया जाने वाला भोजन गुणवत्ता और मात्रा में श्रेष्ठ है। उनकी पाचन शक्ति भी अच्छी होती है। धान्य का सम्मान करें। यह है धान्य लक्ष्मी। दुनिया में भोजन हर व्यक्ति के लिए आव्यशक है। भोजन को बर्बाद नहीं करना या खराब नहीं करना। कई बार भोजन जितना बनता है उसमें से आधे से ज़्यादा फेंक देते हैं,‌ औरों को भी नहीं देते। यह नहीं करना। भोजन का सम्मान करना ही धान्य लक्ष्मी है।

धैर्य लक्ष्मी (Dhairya Lakshmi)

घर में सब है, धन है, धान्य है, सब संपन्न है मगर डरपोक हैं। अक्सर, अमीर परिवारों के बच्चे बड़े डरपोक होते हैं। हिम्मत यानी धैर्य एक संपत्ति है। नौकरी में हमेशा यह पाया जाएगा कि लोग अपने अधिकारियों से डरते हैं। बिजनेस मैन हो तो इंस्पेक्टरों से डरते रहते हैं।

हम अक्सर अधिकारियों से पूछते हैं कि आप किस प्रकार के सहायक को पसंद करते हैं? जो आपके सामने डरता है या जो धैर्य से आपके साथ संपर्क करता है? जो आपसे डरता है वह आपको कभी सच नहीं बताएगा, झूठी कहानी बता देगा। ऐसे व्यक्ति के साथ आप काम कर ही नहीं पाओगे। आप वही सहायक पसंद करते हो जो धैर्य से रहे और ईमानदारी से आपसे बात करे। मगर आप क्यों डरते हो आपके अधिकारियों से? क्योंकि आप अपने जीवन से जुड़े नहीं हैं। हमको यह नहीं पता है कि हमारे भीतर ऐसी शक्ति है, एक दिव्यशक्ति है जो हमारे साथ हमेशा के लिए है। यह धैर्य लक्ष्मी की कमी हो गई। धैर्य लक्ष्मी होने से ही जीवन में प्रगति हो सकती है नहीं तो नहीं हो सकती। जिस मात्रा में धैर्य लक्ष्मी होती है उस मात्रा में प्रगति होती है। चाहे बिजनेस में हो, चाहे नौकरी में हो। धैर्य लक्ष्मी की आवश्यकता होती ही है।

– गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर

संतान लक्ष्मी (Santana Lakshmi)

ऐसे बच्चे हों जो प्यार की पुंजी हों, प्यार का संबंध हों, भाव हों, तब वह संतान लक्ष्मी हुई। जिस संतान से तनाव कम होता है या नहीं होता है वह संतान लक्ष्मी है। जिस संतान से सुख, समृद्धि, शांति मिलती है, वह है संतान लक्ष्मी। और, जिस संतान से झगड़ा, तनाव, परेशानी, दुःख, दर्द, पीड़ा हुआ, वह संतान, संतान लक्ष्मी नहीं होती।​

विजय लक्ष्मी (Vijaya Lakshmi)

कुछ लोगों के पास सब साधन, सुविधाएँ होती हैं, फिर भी किसी भी काम में उनको सफलता नहीं मिलती। सब कुछ होने के बाद भी किसी भी काम में वे हाथ लगाएँ, वह चौपट हो जाता है। काम होगा ही नहीं। यह विजय लक्ष्मी की कमी है। आप किसी को बाज़ार में कुछ लेने भेजोगे तो बस उसे नहीं मिलती। रिक्शा करेंगे तो बिगड़ जाएगी। टैक्सी से अगर बाज़ार पहुँच भी गए तो दुकानें सब बंद मिलती हैं। आपको लगेगा इससे अच्छा होता कि मैं खुद ही जाकर यह काम कर लेता। जो छोटे से छोटा काम भी नहीं कर पाते हैं उनमें विजय लक्ष्मी की बहुत भारी कमी है। कुछ न कुछ बहाना बताएँगे या बहाना न भी हो तो परिस्थितियाँ ऐसी हो जाएँगी उनके सामने। कुछ भी काम में सफलता नहीं मिलती। यह विजय लक्ष्मी की कमी है।

राज लक्ष्मी (Raj Lakshmi)

राज लक्ष्मी कहें चाहे भाग्य लक्ष्मी कहें, दोनों एक ही हैं। कई बार कोई मंत्री उच्चतम पद पर कब्ज़ा करके बैठता है। तब कुछ भी बोलता है पर कोई सुननेवाला नहीं होता। उनकी हुकूमत कोई नहीं सुनता। ऐसा कार्यालय में भी कई बार होता है। मालिक की बात कोई नहीं सुनता मगर एक क्लर्क की बात सब सुनते हैं। वह अपना राज चलाएगा। एक ट्रेड यूनियन के प्रमुख के पास जितनी राज लक्ष्मी है, शायद ही किसी शहरी मिल मालिक के पास होती है। मिल का तो वह सिर्फ ट्रेड यूनियन प्रमुख है मगर उसके पास राज लक्ष्मी है। वह राज चला सकता है। शासन करने की शक्ति है राज लक्ष्मी।

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गुरुदेव का कालातीत ज्ञान

पुस्तक, फोटो फ्रेम और भी बहुत कुछ

यह आठ प्रकार के धन सभी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति में यह आठ धन अधिक या कम मात्रा में होते हैं। हम उन्हें कितना सम्मान करते हैं, उनका कैसे उपयोग करते हैं, हमारे ऊपर निर्भर है। इन आठ लक्ष्मी की अनुपस्थिति को अष्ट दरीद्रता कहा जाता है। चाहे लक्ष्मी हैं या नहीं, नारायण को अभी भी अनुकूलित किया जा सकता है। नारायण दोनों के हैं – लक्ष्मी नारायण और दरिद्र नारायण!

दरिद्र नारायण परोसा जाता है और लक्ष्मी नारायण की पूजा की जाती है। पूरे जीवन का प्रवाह दरिद्र नारायण से लक्ष्मी नारायण तक, दुख से समृद्धि तक, जीवन में सूखेपन से दैवीय अमृत तक जा रहा है।

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