देखो, जब कोई बहुत बैचेन होता है तब वह समय के बड़े जागरूक होता है, जैसे जैसे हर एक क्षण गुजरता है। उसका पूरा ध्यान किसी एक आगे आने वाली घटना पर होता है, समय पर नहीं। जैसे किसी ट्रेन-बस की प्रतीक्षा करते समय, व्यक्ति इसी धुन में रहता है, क्या ट्रेन आ रही है? क्या ट्रेन आ रही है?
इस तरह पूरा ध्यान उस वस्तु पर लगा रहता है, समय पर नहीं। इसमें यदि तुम थोड़ा सा बदलाव कर के देखो, जब तुम किसी की प्रतीक्षा कर रहे हो, ट्रेन की, चिकित्सक की, किसी की भी, उस समय तुम केवल उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगो। प्रत्येक क्षण, एक एक गुजरते हुए क्षण के लिए सजग होते जाओ।
क्या तुम यह समझ रहे हो? यही योग है, वर्तमान क्षण से जुड़ जाना ही योग है। जब मन इसी क्षण में हो, और प्रतीक्षा कर रहा हो, किसी वस्तु या परिस्थिति की नहीं, पर फिर भी प्रतीक्षा में हो। यह तुम्हारी चेतना में एक नया बदलाव ले आता है। इससे तुम्हारी बुद्धि प्रखर हो जाती है और हृदय कोमल हो जाता है। यही क्रिया योग है।
दैनिक श्री श्री योग
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साधनपादः
पतंजलि साधना पथ के पहले सूत्र में कहते है:
तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः ॥१॥
क्रिया योग अर्थात कर्म का योग। कर्म ही इस प्रकृति का ताना- बाना है। पूरा ब्रह्माण्ड, एक परमाणु से लेकर, सूरज चाँद सब सक्रियता से ओतप्रोत हैं। पूरा अस्तित्त्व ही क्रियाशील है, ऐसा कुछ है ही नहीं जो स्थिर हो, अचल हो। सब कुछ ही व्यस्त और चलायमान है। असीम ब्रह्मण भी अनंत क्रियाओं से भरा हुआ है। कहीं भी कुछ शांत है ही नहीं, और तो और नींद में भी तुम क्रियाशील होते हो। तुम्हें ऐसा लग सकता है कि निद्रा के समय सब कुछ ठहर जाता है, पर निद्रा में भी अनंत क्रियाएँ चलती रहती हैं। तुम्हारा शरीर जागने से अधिक निद्रा के दौरान बढ़ता है। इसलिए एक बढ़ता हुआ छोटा शिशु अधिक सोता है और वृद्ध, युवाओं से कम सोते हैं, क्योंकि युवाओं में भी निद्रा के दौरान कई चयापचयी क्रियाएँ निरंतर चलती रहती हैं। छोटे शिशु के शरीर में कोशिकाएँ विभाजित होकर बढ़ती रहती हैं और निरंतर शरीर को बनाती जाती हैं। यदि तुम किसी को ठीक से सोने न दो, तो तुम देखोगे कि वह अलग तरह से बड़े होते हैं। निद्रा के दौरान अत्यधिक क्रियाएँ सतत चलती रहती हैं।
ठहराव में भी गतिविधि है और गतिविधि में भी भीतर कहीं ठहराव है। कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं, कि हे पार्थ! क्या तुम जानते हो, ज्ञानी की पहचान क्या हैं? अर्जुन कहते हैं, “नहीं भगवन, तब कृष्ण कहते हैं, ज्ञानी वही है, जो गतिविधि में स्थिरता को और स्थिरता में गतिविधि को देखता है”।
तुम किसी गतिविधि में ठहराव और स्थिरता में गतिविधि को कैसे देख सकते हो? इसके लिए तुम्हारी जागरूकता में प्रखरता और बुद्धि में तीक्ष्णता होने की आवश्यकता है। यह प्रखरता तभी संभव है जब तुम्हारे कर्म में कौशल हो। कर्म की कुशलता ही योग है।
क्रिया योग क्या है?
क्रिया योग तीन भागों से मिलकर बनता है।
पहला है तपः
तपः का अर्थ है सहनशक्ति और स्वीकारता, जैसे तुम मानो एक प्लेन में लम्बी यात्रा कर रहे हो, बैठे बैठे तुम्हारे पैर भी सुन्न होने लगे हैं। तुम्हें थकान भी लगी हो पर फिर भी तुम बैठे रहते हो। तुम्हें भारीपन भी लगे तब भी तुम बैठे रहते हो। तुम यह नहीं कह सकते की मुझे अच्छा नहीं लग रहा, मुझे प्लेन से बाहर निकालो। यह कोई रास्ता नहीं है।
यदि प्लेन के उतरने में कहीं विलम्ब हो जाए तो हमें उसमें रहना होता है। परन्तु यदि जहाँ तुम्हारे पास विकल्प होती है तब तुम आठ घंटे के लिए ऐसे नहीं बैठोगे। यह संभव ही नहीं है। प्लेन में तुम जैसे बिना शिकायत किए, सहन कर के बैठते हो, वही तपः है।
विपरीत परिस्थितियों से बिना बड़बड़ाते हुए निकलना तपः है। जैसे मान लो, तुम कहीं गाडी चला के जा रहे हो और तुम्हारे सोने का समय हो गया है। तब तुम यह नहीं कहते की मुझे सोना है और जो भी 2-3 घंटे गाड़ी चलाते रहते हो, वही तपः है। जब तक असहनीय न हो तब तक तुम गाड़ी को खड़ा कर के नहीं सोते हो, वही तपः है।
इसी तरह तुम जब व्रत रखते हो, भूख लगती है पर तुम उस को सहन कर अपने व्रत के निश्चय को बनाए रखते हो।
जब तुम कुछ स्वयं से ऐसा करने का निश्चय करते हो, जो तुम्हारे लिए सामान्य नहीं है, वह तपः है। जिसका लाभ बड़ा अच्छा है और तुम्हें वह लाभ भी पता है की मेरे लिए इससे यह लाभ होगा, तब तुम वह निश्चय के साथ करते हो, तब वह तपः है।
जैसे व्यायाम करना, कसरत करना, उन्हें इसमें कुछ मजा नहीं भी आता हो फिर भी लोग करते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि यह उनके लिए लाभदायी है। यही सहनशक्ति तपस है।
स्वाध्याय अर्थात जागरूक होना, स्वयं के विचारों और भावनाओं के प्रति जागरूकता और ईश्वर प्रणिधान अर्थात ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव और आस्था, इन्हीं तीनों से ही क्रिया योग घटित होता है। इससे क्या होता है?
समाधिभावनार्थः क्लेश तनूकरणार्थश्च ॥२॥
इनसे दुःख क्षीण होता है और समाधिभावनार्थः, समाधि और समता के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। कुछ ऐसे लोग होते हैं जो बड़ी गर्मी के दिनों में भी बिना जूते चप्पल पहने हुए गरम जमीन पर घूमते हैं, देखने में ऐसा लगता है कि वे लोग अपने आप को क्यों इतना परेशान कर रहे हैं? परन्तु यदि तुम उनसे बात करोगे तो पाओगे कि उन्हें ऐसे घूमने की आदत हो जाती है और उनका शरीर साधारण से कहीं अधिक मजबूत भी हो जाता है और ऐसी गर्मी को झेल पाता है।
तपः तुम्हें कहीं न कहीं मजबूत बना देता है। जैसे यदि तुम केरल के रहने वाले हो और ऋषिकेश में आओ तब तुम्हें वहाँ की सर्दी भी बहुत ज्यादा लगेगी। परन्तु यदि तुम कश्मीर के हो और ऋषिकेश आओगे तब तुम्हें ऋषिकेश की सर्दी बराबर लगेगी। क्योंकि शरीर कश्मीर में बड़े सर्द मौसम का आदतन बन चुका होता है।
जो भी तुम्हारे लिए आसान नहीं है, उससे भी इच्छापूर्वक निकलना ही तपसः है। अगले ज्ञान पत्र में हम विस्तार से जानेंगे, तपस, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान क्या है?
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
मन वर्तमान क्षण में रहना सीख जाता है।व्यक्ति की बुद्धि प्रखर और तीक्ष्ण हो जाती है।
हृदय अधिक कोमल, संवेदनशील और करुणा से भर जाता है।
तपस (सहनशक्ति): विपरीत परिस्थितियों में भी बिना शिकायत किए स्वेच्छा से टिके रहना या सहनशक्ति विकसित करना।स्वाध्याय (स्व-अध्ययन): अपने स्वयं के विचारों, भावनाओं और कार्यों के प्रति निरंतर सजग रहना।
ईश्वर प्रणिधान (समर्पण): ईश्वर या सर्वोच्च सत्ता के प्रति पूर्ण श्रद्धा, आस्था और समर्पण का भाव रखना।














