कोरोनावायरस लॉकडाउन का समय हम सब के लिए कठिन परीक्षा का समय रहा है। तथापि, कुछ लोगों के लिए यह समय शेष लोगों की तुलना में अधिक कष्टकारी था। ऐसे लोगों में बुजुर्ग, दिहाड़ी मजदूर, अल्प आय वाले परिवार, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता तथा पुलिस के लोग शामिल हैं। बहुत से लोगों को खाद्य सामग्री के अभाव का सामना करना पड़ा और कई अन्य को अपने परिवारों से दूर रहने की चिंताजनक स्थिति  से गुजरना पड़ा।

देश भर में आर्ट ऑफ लिविंग के अनेक कार्यकर्ता, अपनी स्वयं की सुरक्षा की उपेक्षा का जोखिम उठा कर भी लॉकडाउन से प्रभावित लोगों तक पहुंचे हैं। हम उन्हें लॉकडाउन के नायक कहते हैं! यहाँ कुछ ऐसे नायकों के प्रेरणादायक कथानक साझा किए जा रहे हैं जिन्होंने हर विषमता को लाँघते हुए, प्रभावित लोगों तक पहुँच कर अपनी छाप छोड़ी है।

राम कुमार लामा, पश्चिम बंगाल

“हमें लगभग डेढ़ घंटे का मार्ग पैदल तय करना था। किंतु हमारे कंधों पर राशन के किट लटके हुए थे, जिससे यह सफर लंबा लग रहा था। गत शाम के अग्निहोत्र और योग सत्र हमारी ऊर्जा को बनाए रखने में सहायक बने। हम पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले के कालचीनी ब्लॉक के एक गाँव की ओर जा रहे थे – यह गाँव भूटान की सीमा पर स्थित कुछ गाँवों के समूह का एक हिस्सा है। इनमें से बहुत से गाँवों तक सड़क मार्ग से नहीं पहुँचा जा सकता। पहाड़ी इलाका होने के कारण, यह गाँव कभी ट्रेकरों की मंजिल हुआ करते थे।

जब लॉकडाउन की घोषणा हुई तो मुझे संशय था कि प्रशासन यहाँ  पहुँचेगा भी या नहीं। दुर्भाग्यवश मेरा संदेह सही था। बहुत से गाँवों में दुकानें बंद थीं और जिन लोगों के पास कुछ बचत की राशि बची हुई थी, उन्हें भी आवश्यक सामान खरीदने के लिए बहुत दूर तक जाना पड़ता था। हमारे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने स्थिति का आंकलन किया और उन परिवारों की सूचना दी जिन्हें सहायता की सख्त आवश्यकता थी।

उनमें से एक पच्चीस वर्षीय, पाँच बच्चों की माँ का परिवार भी था।  सबसे छोटा बच्चा मात्र एक महीने का था। उसका पति केरल में  दिहाड़ी मजदूरी करता था और वह घर पैसा भेजने में असमर्थ था। उस महिला को खाद्य सामग्री की तुरंत आवश्यकता थी। जब हमने उसे एक महीने का राशन दिया तो उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। सभी बत्तीस गाँवों में, जहाँ हम पहुँचे, भोले भाले ग्रामीणों ने हमें भगवान ही समझा। परंतु हम साधारण लोग ही थे जो नहीं चाहते थे कि हमारे समाज में कोई भी व्यक्ति भूखा रहे।”

राम कुमार लामा की स्वयंसेवकों की टीम पश्चिम बंगाल के कालचीनी ब्लॉक के 32 दूरवर्ती गांवों तक पहुंची। उन्हें एक गाँव तक पहुँच कर सहायता उपलब्ध करवाने में एक दिन लग जाता था। दिन भर के कठिन कार्य के उपरांत शाम के समय वे अपनी साधना करते थे।

शीतल, दिल्ली

“लॉकडाउन की घोषणा के पश्चात मेरी माँ को शहर में फँसे हुए दिहाड़ी मजदूरों की चिंता सता रही थी। इस शहर में अधिकतर प्रवासी मजदूरों को रहने के लिए घर नहीं है। बहुत सारे तो शेल्टर होम्स (आश्रय घरों) में रहते हैं और बहुत से सड़कों के छिपे कोनों में रात गुजारते हैं। इसलिए सूखा राशन उनके लिए कुछ विशेष काम का नहीं है। मेरी माँ उनकी सहायता करना चाहती थी और लॉकडाउन के एक दिन बाद ही उन्होंने स्थानीय प्रशासन से भोजन खिलाने की अनुमति प्राप्त कर ली।

पहले उन्होंने 10 लोगों के लिए भोजन बनाना आरंभ किया, फिर 70 लोगों के लिए। शीघ्र ही उन्होंने कैटरिंग कार्य में लगे हमारे मित्रजनों से बड़े बर्तन माँग कर 200 लोगों का भोजन बनाना आरम्भ कर दिया। आर्ट ऑफ लिविंग कार्यकर्ताओं के मेरे समूह में यह विचार बिजली की तरह फैल गया और इस प्रकार प्रोजेक्ट अन्नपूर्णा का उदय हुआ। आर्ट ऑफ लिविंग, रोटरी क्लब और बी एल के (BLK) अस्पताल के सहयोग से हम केंद्रीय दिल्ली के दो शेल्टर होम्स में भोजन की सेवा करने लगे। शीघ्र ही यह समाचार फैल गया। हमारे स्वयंसेवक संसाधनों की कमी होते हुए भी प्रत्येक नए अनुरोध को स्वीकार करने लगे। परंतु, कहीं से भी संसाधन आते गए और हमारी टीम अब आठ शेल्टर होम्स की सेवा कर रही है।

उधर यह सब हो रहा है और इधर हमारा परिवार परंपरा बनाए हुए है : मेरे पिता जी सब्जियाँ काटते हैं, माँ अन्य बड़ी उम्र की महिलाओं के साथ मिल कर भोजन पकाती है, और मैं बाहर खाना बाँटने जाती हूँ। भोजन वितरण का मेरा स्थान साइकिल रिक्शा चलाने वाले लोगों का अड्डा है जो मुझे देख कर खुश हो जाते हैं। अब तो वह माँग करते हैं कि उन्हें यह खाना है, वह खाना है। हम भी मान लेते हैं क्योंकि हम उनकी चिंता कम करना चाहते हैं। नहीं तो शायद वे लोग लॉकडाउन नियमों का उल्लंघन करेंगे जिससे वायरस अधिक फैलेगा। किंतु मेरी माँ उनकी माँग पूरी करने में संकोच नहीं करती। वह उनके लिए खाना पका कर ही प्रसन्न है। कभी कभी मुझे आश्चर्य होता है कि वह बिना थके इतना खाना कैसे पका लेती हैं। वह मुस्कुराते हुए जवाब देती है, “मुझे नहीं पता।”

अभी तक प्रोजेक्ट अन्नपूर्णा अपने 50 कार्यकर्ताओं के साथ शहर में फँसे दिहाड़ी मजदूरों को 60,000 से अधिक थाली भोजन बाँट चुकी है। दिल्ली शहर के स्वयंसेवकों की टीम दिहाड़ी मजदूरों में प्रतिदिन 7,000 से 10,000 भोजन की थालियाँ बाँट रही है।

ऋतु नारंग, मुरादाबाद

“सभी तरह की अव्यवस्था के बीच भी योग में राहत देने की क्षमता है। मैंने योग द्वारा वर्दीधारियों, जेल के कैदियों, बुजुर्गों तथा अन्य सभी लोगों के जीवन  में परिवर्तन होते हुए देखा है। इसलिए जब मुरादाबाद के जिला मजिस्ट्रेट ने मुझे शहर में फँसे हुए दिहाड़ी मज़दूरों के लिए योग के सत्र संचालित करने के लिए बुलाया तो मैंने तुरंत हामी भर दी। मैंने शहर में चार आश्रय गृहों में योग सत्र संचालित किए। अपने भय और सभी प्रकार की चिंताओं को पार करते हुए प्रवासी मजदूर एक घंटे के योग सत्र के पश्चात बहुत शांत और तनाव मुक्त महसूस करते थे।

मैंने अपने सत्रों में उनको स्वयं और उनके परिजनों को महामारी से बचने के लिए निर्देशों को भी शामिल किया तथा उनको रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाले योगासनों के विषय में बताया और उसे अपने परिजनों को भी बताने को प्रेरित किया। एक प्रकार से वे सभी कोविड -19 के योद्धा थे जो घर पहुँच कर स्वयं को तथा अपने समाज को सुरक्षित रखने  में सहायक बनने वाले थे।”

रितु नारंग एक श्री श्री योग प्रशिक्षक है जो मुरादाबाद में योग गुरु के नाम से विख्यात है।

आकाश, चंडीगढ़

“लॉकडाउन के आरम्भिक दिनों में हमें झुग्गी झोपड़ियों के निवासियों की ओर से संदेश मिले। पूर्व में हम वहाँ कई नवचेतना शिविर लगा चुके थे जिससे हमारा उनसे संबंध घनिष्ठ हो गया था। उनके पास न तो खाने का सामान था और न ही धन। मैंने मन ही मन इस पर मंथन किया। हमारे स्वयंसेवकों की टीम ने प्रशासन से अनुमति ली और चंडीगढ़ तथा मोहाली के झुग्गी झोपड़ी वासियों तक खाद्य सामग्री पहुँचाना आरम्भ किया। उनमें से बहुत से लोग तो प्रवासी मजदूर थे जो अपने घर पहुँचने में असमर्थ थे। हम अपने उपलब्ध साधनों द्वारा उनकी हर संभव सहायता कर रहे हैं, जैसे कि उनके साथ अपने फोन नंबर साझा करना, नियमित रूप से कुशल क्षेम पूछना, उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना आदि। क्योंकि भोजन से अधिक उन्हें इस सांत्वना की आवश्यकता थी कि कोई उनके पीछे खड़ा है।”

आकाश आर्ट ऑफ लिविंग चंडीगढ़ के अनेक कार्यकर्ताओं में से एक है, जो दिहाड़ी मजदूरों तक पहुँच रहे हैं। यह नेक व्यक्ति रोज बाहर जा कर राहत सामग्री के पैकेट बाँटते हैं। यह टीम अब तक 1,000 परिवारों तक सहायता पहुँचा चुके हैं। इस टीम ने स्वास्थ्य कर्मियों को हैंड सैनिटाइज़र, पी पी ई किट तथा मास्क उपलब्ध करवाने में भी सहायता की है।

सभी प्रकार के एहतियाती उपायों तथा बताए गए स्वास्थ्य रक्षा नियमों का पालन करने के बाद भी कुछ लोग आकाश को संशय और भय की दृष्टि से देखते हैं। और सोचते हैं, उसके परिवार का क्या होगा?

वह गर्व महसूस करते हुए कहते हैं, “मैं जिन लोगों से दिन भर में मिलता हूँ, उनके विषय में औरों को बताता हूँ तो उनकी प्रतिक्रिया होती है, किसी को तो यह करना ही होगा।”

रेशमा, मुंबई

जैसे ही मैं उन गलियों में जाने के लिए घर से निकलने को हुई तो पिता जी की आवाज आई, “50 पॉजिटिव केस हैं वहाँ पर।” मेरे  बाएँ हाथ में दस्ताने और मास्क तथा राशन किटों का एक बैग दाएँ हाथ में उठाते हुए, मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, “मैं सुरक्षित रहूँगी, पापा।” मेरे पिता जी बहुत तनाव में थे। मैंने और अधिक विश्वास के साथ कहा, “कुछ नहीं होगा।” बाहर आकर मैंने दूसरे स्वयंसेवकों को दस्ताने और मास्क बांटे जो जरुरतमंद लोगों तक राहत पहुँचने के लिए तैयार खड़े थे।

धारावी और उसके आसपास के इलाकों में काम करते हुए हमें फैक्ट्री कर्मचारी मिले जिनके घर में स्टोव तक नहीं थे, पुल के नीचे रहते हुए कैंसर के मरीज और घरेलू नौकर जिनके पास बचत की कोई राशि नहीं थी, भी मिले। हमने ऐसे लोगों को तैयार भोजन और राशन किट वितरित किए हैं। बहुत से मौकों पर हमें गलियों में बाहर निकलने के लिए पुलिस ने रोका। किंतु जब हमने इसका कारण और उद्देश्य बताया तो उन्होंने हर बार हमें जाने दिया। एक बार कोई व्यक्ति हमें एक दिव्यांग बुजुर्ग के घर में ले गया जो केवल प्लेन चावल और नमक खा कर गुजारा कर रहा था। जब हम वहाँ राशन की किट लेकर पहुंचे तो उनकी आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने कहा , “ भगवान मेरी सहायता को आए हैं।”

“धारावी में कोरोना केसों की संख्या 200  तक पहुँच गई है और बढ़ रही है। हम अब घर में ही रहते हैं। परंतु हम अब भी उन लोगों तक पहुंचते हैं जिनको हमारी आवश्यकता है। मैं बस एक फोन कॉल पर उपलब्ध हूँ।”

रेशमा और उनकी टीम ने धारावी और उसके आस पास दो सप्ताह तक प्रतिदिन  राशन के 800  किट और 2,000  तैयार भोजन के पार्सल बांटे हैं और यह तब तक चला जब तक उस झुग्गी झोपड़ी कॉलोनी में कोरोना के केस बढ़ नहीं गए।

विवेकानंद, कोलकाता

“जिस दिन लॉकडाउन की घोषणा हुई, पुलिस वाले 12 घंटे की रात्रि ड्यूटी पर थे। फ़ूड डिलीवरी बॉयज पर काम का अत्यधिक दबाव था। सुनसान सड़कों पर, जहाँ भोजनालय/ खाने की दुकानें बंद थीं, वे लोग थके हारे और भूखे रहते हुए काम कर रहे थे। हमने उन लोगों को भोजन और कोल्ड कॉफ़ी बाँटते हुए रात बिताई। मुझे याद है हमें एक डिलीवरी बॉय मिला जिसकी मोटरसाइकिल खराब हो गई थी। बहुत अधिक कहने के पश्चात वह अपने स्थान पर हमसे खाना डिलीवर करवाने को राजी हुआ। वह व्यक्ति अब हमारे साथ मिल कर दिहाड़ी मजदूरों को  भोजन वितरण कार्य में  सहायता कर रहा है।

उन सभी लोगों तक पहुँचने के लिए, जिन्हें हमारी आवश्यकता है, हमने 70 स्वयंसेवकों का एक समूह बनाया है। जब भी हमारे किसी कार्यकर्ता को जहाँ से सहायता के लिए कोई संदेश मिलता है, वह कार्यकर्ता ह्वाट्सऐप ग्रुप पर उसे डाल देता/ देती है जिससे सभी लोग हरकत में आ जाते हैं। इस सामूहिक नेटवर्क के माध्यम से हमने बुजुर्गों का संपर्क उन गैर सरकारी संगठनों से कराया है जो भोजन उपलब्ध करते हैं, मलेरिया से पीड़ित एक बच्चे के लिए दवा की व्यवस्था की है और दिव्यांगों के एक आश्रय घर में राशन सप्लाई किया है।

विवेकानंद, आर्ट ऑफ लिविंग के कोलकाता चैप्टर के अनेक कार्यकर्ताओं में से एक है जो लॉकडाउन से प्रभावित लोगों तक पहुचे हैं और उनकी सहायता की है। कोलकाता टीम ने 20,000  से अधिक राशन के किट वितरित किए हैं और यह कार्य निरंतर चल रहा है।

प्रभंजन, औरंगाबाद

“स्थानीय सरकारी अस्पताल के स्वास्थ्य कर्मचारी हड़ताल पर चले गए थे। मुझे एक डाक्टर का फोन आया कि क्या आर्ट ऑफ लिविंग सहायता कर सकते हैं, क्योंकि हमने पहले भी उनके साथ किसी सेवा कार्य में सहयोग किया था। स्थिति बहुत भयावह थी: अस्पताल में कोरोना ग्रस्त रोगी थे और वहाँ मास्क और सैनिटाइजर भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थे। सभी दुकानें बंद थी और स्वास्थ्य कर्मियों को अपनी सुरक्षा के लिए N95 मास्क की आवश्यकता थी। मैंने एक स्वयंसेवक से संपर्क किया जो फार्मास्यूटिकल उपकरण की सप्लाई करता था। उसने 100  मास्क का प्रबंध किया तथा आर्ट ऑफ लिविंग के औरंगाबाद चैप्टर ने 25 लीटर सैनिटाइजर अस्पताल को उपलब्ध करवाया। श्री श्री नैसर्गिक खेती परियोजना से जुड़े हुए किसानों ने अस्पताल के मरीजों तथा क्वारंटाइन किए गए लोगों के लिए 2 टन मीठे नींबू के फल उपलब्ध कराए।

इसी प्रकार, समाज के प्रत्येक वर्ग से हर कोई अपने अपने ढंग से सहायता कर रहा है। मेरा प्रेशर पम्प का व्यवसाय है। अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त, हमने उद्योगों के लिए कीटाणुनाशक (डिसइंफेक्टेंट) बनाने वाले उपकरणों और इकाइयों का निर्माण किया। चीन ऐसी इकाइयों का उपयोग महामारी से लड़ने के लिए कर रहा है। थोड़े अनुसंधान के पश्चात मैंने उनको बनाने का सस्ता उपाय ढूँढ लिया – जिससे उसकी लागत में 80% तक की कमी आई। हमने औरंगाबाद, अहमदनगर तथा जालना में वाहनों के लिए पाँच तथा पैदल चलने वालों के लिए 12 सैनिटाइजिंग टनल दान की हैं। इस महामारी के प्रकोप को देखते हुए यह लॉकडाउन समाप्त होने के पश्चात भी उपयोगी रहेंगे।

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