इराक – एक प्राचीन और समृद्ध सभ्यता, जो युद्ध और विद्रोह में उलझ गई है – ने अपने लाखों करोड़ों अभागे नागरिकों को अपने देश में ही विस्थापित होते हुए अथवा किसी शिविर में शरणार्थी बन कर रहते देखा है।
किसी भी युद्ध से थक चुके लोगों तक राहत और तनाव मुक्ति कार्यक्रम पहुँचाने के लिए समर्पित और प्रतिबद्ध व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। सुश्री मवाहिब शैबानी, जो एक भूतपूर्व बैंकर हैं, भी उनमें से एक हैं।
अपने समुदाय में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से प्रोत्साहित होकर, मवाहिब इराक तथा मध्य पूर्व के कई अन्य क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज (IAHV) के साथ प्रोग्राम डायरेक्टर (कार्यक्रम निदेशक) के रूप में कार्य करते हुए सुश्री मवाहिब विभिन्न सरकारी एजेंसियों, अन्य गैर सरकारी संगठनों, मंत्रालयों तथा विभिन्न समुदायों के साथ सामाजिक तथा मानवीय कार्यों को लेकर संपर्क में रहती हैं। एक ऐसे देश में, जहाँ महिलाओं के अधिकारों को लेकर बहुत सारी गंभीर समस्याएँ हैं, मवाहिब ने अनेक क्षेत्रों में सशक्त प्रयास किए हैं। वह महिलाओं के लिए व्यवसायिक कौशल प्रशिक्षण तथा आघात राहत कार्यक्रम आयोजित करती हैं। उन्होंने अरबील में संसद के 35 सदस्यों के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन भी किया है।
उन्होंने विश्व के सबसे अस्थिर क्षेत्रों में से एक में शरणार्थियों तथा आंतरिक रूप से विस्थापितों के लिए किए गए अपने कार्य पर अनुभव साझा किए हैं:
अरबील में यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई?
जून 2014 में आई एस आई एस (ISIS) ने सुन्नियों के दूसरे सबसे बड़े शहर, मोसुल पर आक्रमण कर दिया तो वहाँ के लोग जान बचाने के लिए अरबील तथा कुर्दिस्तान के सीमा वर्ती क्षेत्रों की ओर भाग गए। इन आघात पीड़ित परिवारों ने अपना सब कुछ खो दिया था। उसके पश्चात आई एस आई एस ने अगस्त में यज़ीदियों पर आक्रमण कर दिया। दो साल पहले आई एस आई एस ने लगभग 5,000 लड़कियों और महिलाओं को बंधक बना लिया।
शिविरों में क्या हो रहा है?
शिविरों में लोग आघात से भयभीत हैं और लगातार दो वर्ष से वहाँ धन, शिक्षा तथा आजीविका के अभाव में बहुत निराश हैं। वे बस विभिन्न क्षेत्रों के स्वतंत्र होने की राह देख रहे हैं।
शरणार्थियों शिविरों तथा आंतरिक रूप से विस्थापितों के शिविरों में अंतर है। शरणार्थी सीरिया से आए हैं। शेष लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं, जो अपने ही देश, इराक के निवासी हैं और युद्ध के कारण बेघर हो गए हैं।
विस्थापित लोगों की पृष्ठभूमि क्या है?
इनमें से अधिकांश लोग सुन्नी समुदाय से आते हैं। कुछ ईसाई लोगों को देश से बाहर शरण मिल रही है और बहुत से यज़ीदी लोग वहाँ से छोड़ कर चले गए हैं, और उनमें से भी कुछ यूरोप में चले गए हैं। जर्मनी की सरकार ने हिंसा तथा बलात्कार पीड़ित कुछ यज़ीदी लड़कियों की ज़िम्मेदारी उठाई है।
अब तक किए गए राहत कार्यों के विषय में हमें कुछ बताएँ।
सबसे पहला शिविर, जहाँ हम भोजन और अन्य राहत सामग्री लेकर पहुँचे, वह था ख़ज़ीर शिविर।
हमने खाज़ी, कार्बैटो, दुहोक आदि कई शिविरों में भोजन, सर्दी के लिए वस्त्र तथा कंबल बाँटे हैं। सिंजर के पहाड़ों में फँसे हुए लोगों तक हमने हवाई जहाजों तथा पैराशूट्स की सहायता से 130 टन राहत सामग्री गिराई है और उसके उपरांत, इस क्षेत्र के पुनः आजाद होने तक 4 टन और सामग्री पहुंचाई है।
यदि इन पहाड़ी क्षेत्रों में भोजन न पहुँचा होता तो वहाँ फँसे हुए लगभग 10,000 लोग भूख से मर जाते। यद्यपि युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है, फिर भी हमने लगभग 200 यज़ीदी महिलाओं को बचाया है।
जब हमें फल्लूजाह तक जाने के लिए सुरक्षित मार्ग नहीं मिला तो हमने भोजन सामग्री मखमूर तक पहुंचाई।
“अरबील में जीवन उपयोगी कार्यशालाएँ आयोजित और संचालित करने में सहायक होना अपने आप में एक पुण्य तथा संतोष देने वाला कार्य है। मैं बहुत कृतज्ञ तथा प्रसन्न हूँ कि उन लोगों की सहायता कर पाई जो इतने भीषण त्रासदी और कठिन दौर से गुजरे हैं।”
— सामेर टामज, एक लेबनानी नागरिक जो पहले कनाडा में कार्य करता था और अब अरबील, कुर्दिस्तान में पूर्णकालिक स्वयं सेवक के रूप में कार्यरत है।
राहत सामग्री पहुँचाने में क्या कोई जोखिम भी थे?
युद्ध में जोखिम तो सदैव होता ही है। कुछ क्षेत्र बहुत खतरनाक हैं, इसलिए हम सेना को कहते हैं कि हमें वहाँ से सुरक्षित निकालने में सहयोग करें। सरकार ने भी भरपूर सहयोग और सहायता दी है। वे न केवल हमें वहाँ जाने के परमिट देते हैं, बल्कि हम स्वयंसेवकों की सहायता के लिए और लोग भी दिलाते हैं और हमारे कार्य को सुगम बनाने में मदद करते हैं।
त्रासदी राहत कार्य में आई ए एच वी (IAHV) की भूमिका के विषय में कुछ बताएँ
हम राहत कार्यों तथा कार्यक्रमों का सम्मिश्रण कर लोगों तक राहत सामग्री उपलब्ध करवाने और उसके साथ साथ पीड़ित लोगों को उनके आघात से मुक्ति के उद्देश्य को लेकर काम करते हैं। लोग बहुत अधिक तनाव में हैं, क्योंकि उन्हें यह भी नहीं पता कि उनके परिवार के शेष सदस्य कहाँ हैं, और वे जीवित हैं भी या नहीं।
हमने युवाओं के लिए लीडरशिप प्रोग्राम, और सुलैमानियाह जेल के पुलिस स्टाफ तथा 75 कैदियों के लिए तनाव मुक्ति कार्यक्रम का आयोजन किया है। अब हम प्रभावित बच्चों के लिए भी कार्यक्रम आरंभ करने जा रहे हैं।
शिविरों में किए गए राहत कार्यों को लेकर महिलाओं की प्रतिक्रिया कैसी रही है?
हमारे साथ अब दो यज़ीदी लड़कियाँ भी कार्य कर रही हैं और महिलाओं की सहायता में जुटी हैं। उनका कहना है, “यह कार्यक्रम करने से पहले मानवता से हमारा विश्वास उठ गया था। अब आपने हमारे जीवन में वह विश्वास पुनः स्थापित किया है।” अब उनमें यह आशा जागृत हुई है कि वे भी दूसरों के जीवन में परिवर्तन ला सकती हैं।
गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर स्वयं वर्ष 2014 में एक शांति मिशन के लिए कुर्दिस्तान की यात्रा पर गए थे। हमें उसके विषय में कुछ और बताएँ।
गुरुदेव की यात्रा से हमारे प्रयासों को गति मिली। वह शिविरों में गए और उन्होंने कुर्दिस्तान के प्रधान मंत्री नेचीरवान बरज़ानी, वहाँ के सांसदो तथा धार्मिक नेताओं से भी मुलाकात की।
हमने तभी वहाँ पहला शांति सम्मेलन भी किया। उसके पश्चात शांति स्थापना के उद्देश्य से हमने लगभग 100 युवाओं को प्रशिक्षित किया है तथा पिछले डेढ़ साल में मनोस्थिति परिवर्तन कार्यशालाओं का आयोजन किया है।
इस सब कार्य से आपको क्या सीख मिली और क्या बोध हुआ
हमने देखा है कि हमारे कार्यक्रम करने के पश्चात युवाओं के उत्साह और ऊर्जा में व्यापक वृद्धि हुई है। वे अब सच में आगे आ कर लोगों की सहायता करने को तत्पर हैं।
यह आश्चर्यजनक है कि पीड़ित युवा अब शांति की भावना समझना और उसे स्थापित करना चाहते हैं। और अब उनके लिए मानवता, न कि धर्म, अधिक महत्वपूर्ण है।
क्या आप युवाओं के लिए आगामी योजनाएँ साझा कर सकती हैं?
मैं चाहती हूँ कि शांति के लिए एक केंद्र स्थापित किया जाए जिसमें हम अधिक से अधिक युवाओं को नेतृत्व क्षमता, कंप्यूटर और मीडिया का ज्ञान, तथा कौशल विकास गतिविधियों में प्रशिक्षण दे सकें।
हम 27 युवाओं को प्रशिक्षक ट्रेनिंग के लिए आर्ट ऑफ़ लिविंग अंतरराष्ट्रीय केंद्र, बेंगलुरु, भारत में ले कर गए हैं। उन्हें “शांति दूत” के नाम से जाना जाएगा और वे अन्य लोगों को प्रशिक्षण देंगे।


















